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... वे जो मारे जाएंगे !

Bhola Tiwari Jun 20, 2019, 10:08 AM IST टॉप न्यूज़
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रंजीत कुमार

लोकतंत्र (थोड़ा बेलाग होकर कहें तो वोट तंत्र) की कई कमजोरियों में एक बड़ी कमजोरी यह है कि यहां वृहद जनसमूह के खिलाफ जाने वाला कड़वा सच को छिपा लिया जाता है। आम तौर पर सत्ता और मीडिया तंत्र ऐसे सच को छिपाते हैं। मगर सच्चे वैज्ञानिक और शोधकर्ताओं को राजनीतिक प्रपंच की परवाह और जरूरत नहीं होती तो वे सच का खुलासा करते रहते हैं। सिटीजन जर्नलिज्म के आविष्कार के कारण उनकी बात मास मीडिया में यदा-कदा आ भी जाती है। ऐसी ही दो शोध संस्था है जो भविष्य की दुनिया का गणना करती है- टीएमपी (द मिलेनियम प्रोजेक्ट) और आईपीसीसी (इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज)। इसमें दुनिया भर के सैकड़ों वैज्ञानिक, शोधकर्ता अपने-अपने शोध को शेयर करते हैं, जिसे संपादित कर हर साल दोनों संस्था अपनी वार्षिक रिपोर्ट तैयार करती है। मैं पिछले कई वर्षों से दोनों ही संस्था की वार्षिक रिपोर्ट को फॉलो कर रहा हूं।  

ये रिपोर्ट लगातार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बताती आ रही है कि तेजी से कॉरपोरेट पूंजीवाद के आगोश में समाती दुनिया का आगामी स्वरूप बहुत सिंगुलर (एकांगी) होने जा रहा है। आने वाले वर्षों में जो गरीब होंगे वे मारे जाएंगे। जो नॉनकंपीटीटिव होंगे वे मारे जाएंगे... वे सत्ता और सत्ता तंत्र की नियामक शक्ति (कॉरपोरेट पूंजी) के हाथों पेरिस होंगे, लेकिन उन्हें उदरस्थ करेगा पर्यावरण संकट। प्राकृतिक संसाधनों के अत्याधिक दोहन के कारण पर्यावरण दिन प्रतिदिन कठोर होता जाएगा। जल संकट गहराएगा, जमीन बंजर होगी, तापमान बढ़ेगा, नई-नई बीमारियां पैदा होंगी और मास पलायन होगा। इससे निपटने के लिए तकनीक ईजाद होंगी , लेकिन वे इतनी महंगी होंगी कि गरीब लोगों के लिए अनुपलब्ध ही रहेगी। संसाधन संपन्न लोग तो विज्ञान और तकनीक के बल पर बचे रह जाएंगे लेकिन गरीब और साधनविहीन के लिए मरने के अलावा कोई अन्य चारा नहीं होगा। प्राकृतिक आपदाओं के समय भी वही होगा, साधन संपन्न बच जाएंगे, साधनविहीन मरते जाएंगे। मुजफ्फपुर की इस बीमारी में भी उपरोक्त आशंका के ट्रेस देखे जा सकते हैं। बीमारी कहीं न कहीं कठोर होते पर्यावरण से जुड़ा प्रतीत होता है, साधनविहीन को चपेट में ले रहा है... वे पेरिस कर रहे हैं...

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