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जब अर्जुन ने श्री कृष्ण के पैर पकड़ माफी मांग ली

Bhola Tiwari Jun 20, 2019, 6:01 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

महाभारत का एक ऐसा ही प्रसंग हम आपको बता रहे हैं, जिसमें युद्ध की खुमारी अर्जुन के सर चढ़कर बोल रही थी। अर्जुन को यह घमंड हो गया था कि महाभारत का महासमर उसकी वजह से जीता गया है। उनके बाहुबल और आग्नेय अस्त्रों के भंडार से कौरवों का सर्वनाश हुआ। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन के घमंड को चूर कर उनको हकीकत की जमीन से रुबरू करवाया था।

एक समय अर्जुन श्रीकृष्ण के साथ बातचीत करते हुए रथ पर सवार होकर भ्रमण कर रहे थे। तभी अर्जुन ने श्रीकृष्ण से यह बात कही कि 'वार्ष्णेय आपने युद्ध में एक बात पर गौर किया कि जब मैं तीर चलाता था जब कर्ण का रथ कई योजन पीछे चला जाता था, जबकि कर्ण के तीरों की वजह से मेरा रथ कुछ योजन ही पीछे जाता था।'

श्रीकृष्ण मंद-मंद मुस्कुराहट के साथ अर्जुन की बातों को ध्यानपूर्वक सुनते रहे। अर्जुन ने आगे कहा, आप कुछ जवाब क्यों नहीं देते हैं। तब कृष्ण ने सोचा कि अब सही वक्त है, अर्जुन के दिल-दिमाग पर छाया हुआ जीत का नशा उतारना जरूरी है।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा 'आओ पार्थ हम रथ से उतरकर कुछ दूर पैदल चलते हैं।' जैसे ही अर्जुन और श्रीकृष्ण रथ से उतरकर गए। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के रथ की रक्षा के लिए हनुमानजी का आभार माना और रथ से प्रस्थान की विनती की। जैसे ही हनुमानजी ने रथ छोड़ा, रथ में आग लग गई और वह जलकर खाक हो गया।

तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि 'पार्थ तुम्हें स्वयं इन्द्र ने अपना रथ युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए दिया था। देवी-देवताओं ने अपने श्रेष्ट आग्नेयस्त्रों का तुम्हारे तरकश में समावेश किया था। महाबली हनुमान तुम्हारे रथ की रक्षा के लिए रथ पर विराजमान थे। मैं स्वयं नारायण तुम्हारे रथ का सारथी था। दूसरी ओर कर्ण से छल से इन्द्र ने कवच-कुंडल ले लिए थे। इन्द्रराज की दी हुई शक्ति भी उनको मजबूरी में घटोत्कच पर चलानी पड़ी थी। एक ब्राह्मण का श्राप था कि उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण युद्ध में उनके रथ का पहिया किचड़ में धंस जाएगा। उनके गुरू परशुराम का श्राप भी उनके साथ था कि युद्ध के अहम क्षणों में वह ब्रह्मास्त्र का ज्ञान भूल जाएंगे, लेकिन इसके बावजूद कर्ण का प्रहार इतना जबर्दस्त होता था कि मैं नारायण, हनुमानजी देवी-देवताओं के आशीर्वाद और इंद्र का दिव्य रथ भी उनके सामने युद्ध में टिक नहीं पाया।'

इतना सुनते ही अर्जुन की आंखों पर चढ़ा युद्ध की गर्वोक्ति का परदा उतर गया और उन्होंने श्रीकृष्ण के पैर पकड़ते हुए उनसे अपनी गलती के लिए माफी मांग ली।

महाभारत की इस कहानी से तीन बातें सीखने को मिलती है। पहली - कभी अपनी उपलब्धि का गुमान नहीं करना चाहिए। दूसरी - जब किसी जीत का जश्न मनाते हैं या किसी चीज को हासिल करते हैं तो उसके पीछे कई लोगों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हाथ रहता है। इसलिए उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। तीसरी सबसे अहम बात यह है कि हो सकता है आपका शत्रु आपसे पराजित हो गया हो, लेकिन उसके गुणों की भी कभी अवहेलना नहीं करना चाहिए।

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