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प्रायोगिक हो, वही हल ढूँढा जाए

Bhola Tiwari Jun 20, 2019, 5:13 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा

(जाने माने चिकित्सक नार्वे)

‘हेल्थ इकॉनॉमी’ मेरा प्रिय मुद्दा तो है ही, लेकिन इसमें ओवरऑल कन्फ्यूज़न बहुत नजर आ रहा है। नॉर्वे का उदाहरण दिया, लोगों ने खूब शेयर किया। लेकिन ‘फ्री हेल्थकेयर’ के विषय में लोग अंदाजा लगाते हैं कि सब मुफ्त होगा। जबकि यह ‘पेड हेल्थकेयर’ के बनिस्बत मँहगा सौदा है।

औसतन हर वेतनधारी यहाँ साल में तीन से छह लाख रुपए सरकार के उस फंड में डालते हैं, जो स्वास्थ्य सुविधाएँ देती है। आपको बीमारी हो या न हो। अगर आप मना करते हैं, तो बीमारी होने पर खर्च आपको वहन करने हैं जो काफी मँहगी है। इसलिए, सब देते ही हैं। 

दूसरी बात कि प्रति ओपीडी विजिट आप लगभग सोलह सौ रुपए देते हैं, और प्रति जाँच भी लगभग इतने ही रुपए देने होते हैं। दवा भी खुद ही खरीदनी होती है। 

तो फ्री क्या है? फ्री है अस्पताल खर्च, जहाँ आपको नॉर्वे में भेजा ही नहीं जाता। दर्द से कराहते रहिए तो भी जाँच में कुछ न निकला तो अस्पताल में जगह नहीं मिलेगी। 

और ऐसी फ्री सुविधा देने के लिए भी दुनिया के एक अमीर देश को अपने जी.डी.पी. का आधा एलोकैट करना होता है। और एक-एक पैसे का हिसाब रखना होता है। अब आप बताइए कि भारत जैसा देश एक प्रतिशत जी.डी.पी. पर नॉर्वे के ढाई सौ गुणा जनसंख्या को कैसे मुफ्त सुविधा देगा? 

स्वास्थ्य मंत्री कह गए कि सौ बेड का आईसीयू बना देंगे! मैंने जीवन में सौ बेड का आईसीयू और उसमें पचास वेंटिलेटर नहीं देखा। यह असंभव है, देश अगर सोने क्या, हीरे की चिड़िया होता तो भी। ऐसा सपना कोई नहीं देखता और इसलिए कहता हूँ कि जो प्रायोगिक हो, वही हल ढूँढा जाए। हल अस्पताल से बाहर है, कम खर्च में है और स्थायी है। 

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