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देशभक्ति की अभिव्यक्ति है प्रवासी राष्ट्रवाद

Bhola Tiwari Jun 19, 2019, 5:39 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा

(जाने माने चिकित्सक नार्वे)

‘प्रवासी राष्ट्रवाद’ (Diaspora nationalism) एक आवश्यक और मूलभूत संकल्पना है। कई देश इसी राष्ट्रवाद पर स्थापित और मजबूत भी हुए। मैं पहले भी चर्चा कर चुका हूँ कि अफ्रीकी अमरीकियों को एक दिन अचानक लगा कि उनका असल घर तो अफ्रीका है। सबने अफ्रीका पहुँच कर वहाँ का एक इलाका घेर लिया, और ‘Liberia’ (लिबरेशन शब्द से) देश बन गया। 

यही हाल दादा भाई नोरौजी, गांधी, श्यामजी कृष्ण वर्मा, सावरकर इत्यादि के लंदन में पनपे राष्ट्रवाद की है। एक निष्कर्ष यह भी है कि न ये लंदन जाते, न देशप्रेम पनपता। पर यह ज्यादा हो जाएगा। इज़रायल के बनने में अमरीका में पलायित यहूदियों का बड़ा हाथ रहा है। आयरलैंड के लिए आईरिश अमेरिकन तो तमाम आंदोलन करते ही रहे हैं। और खालिस्तान के लिए कनाडा के सिख। इसमें अच्छा-बुरा छाँट लीजिए, पर यह राष्ट्रवाद एक प्राकृतिक प्रक्रिया है।

समस्या तब आती है, जब यह नहीं होता। जब प्रवासी भारत को एक आदिकालीन ग्राम (primitive village) कह कर इससे दूर रहना पसंद करते हैं। हरगोविन्द खुराना भारत से हताश हो जाते हैं। बॉबी जिन्दल कहते हैं कि भारत से कोई मतलब ही नहीं। तमाम गिरमिटिया वंशज (राजमोहन जी सरीखों को छोड़ कर) भारत से कट जाते हैं। और लंदन में लोग प्रधानमंत्री का विरोध करते हैं। 

यह होना भारत में बैठे किसी राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी को अच्छा लग सकता है, पर यह अप्राकृतिक है। वो मुहावरा है कि अपने गंदे कपड़े घर में ही धोए, बाहर धोने न बैठ जाएँ। यह बात प्रवासी भारतीयों को सीख लेनी चाहिए। लंदन या किसी बाहरी देश में भारतीय प्रधानमंत्री का विरोध अपनी जग-हँसाई को न्यौता देना है।

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