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रांड़,सांड़,सीढ़ी ,सन्यासी ...

Bhola Tiwari Jun 19, 2019, 5:07 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

काशी में विधवाओं की अच्छी खासी बस्ती बसी हुई है ,जो कि भारत के अलग अलग प्रदेशों से आई हुईं हैं. 90% विधवाएं तो बंगाल प्रांत की हीं हैं . बंगाल की विधवाओं की दशा अत्यंत शोचनीय थी . उन्हें गायत्री मंत्र तक पढ़ने की मनाही थी .पति की मौत के बाद वे अत्यंत असहाय हो जाती थीं .उनका साज श्रृंगार पति के साथ हीं चला जाता . उन्हें किसी भी मांगलिक कार्य में शामिल नहीं किया जाता . इसलिए ये विधवाएं स्वेच्छा से काशी आ जाती थीं .

काशी आकर इन विधवाओं की अलग दुनिया हो जाती थी .सफेद धोती , सिर मुंडित ,माथे पर चंदन तिलक आदि उनका ड्रेस कोड था .मंदिरों में भजन करना ,दरवाजे दरवाजे घूमकर भिक्षाटन करना हीं इन विधवाओं की दिनचर्या थी .कालांतर में परित्यक्त महिलाएं भी विधवा का चोला पहनकर यहां आने लगीं. इन परित्यक्त व कुछ कम उम्र की विधवाओं का अपनी दैहिक भूख पर नियंत्रण नहीं रहा . वे देह व्यापार में रम गईं ,जिससे काशी की बदनामी हुई .

काशी की बदनामी सांढ़ों की वजह से भी हुई . जिसे देखो सांढ़ के कमर पर गर्म सलाखों से त्रिशूल के निशान बना देता .अब ये सांढ़ बन जाते थे भोले बाबा की सवारी . इनके सातों खून हो जाते थे माफ . जिसे चाहें ये सिंघ से उठाकर पटक दें ,कोई कुछ नहीं कहता. नंदी जी ने तो अमेरिका के राष्ट्रपति की पत्नी को भी सिंघ पर उठा लिया था . नाटी इमली के मैदान में सन् 1852 में तत्कालीन कलेक्टर ग्राविंस ने स्थानीय जनता के साथ मीटिंग की . मीटिंग में इन साढ़ों को पकड़ कर कूड़े गाड़ी में जोतने का सुझाव रखा गया . यह सुझाव शिव भक्तों को आक्रोशित कर गया . शिव का वाहन कूड़ा गाड़ी में जुते ? यह सुझाव उनको बहुत नागवार गुजरा . वे पास की दूकान से मिट्टी के हुक्के उठा उठाकर कलेक्टर व अन्य अफसरों पर फेंकने लगे . कलेक्टर के साथ साथ अन्य अफसर भी चोटिल हुए . मीटिंग बेनतीजा रही .

आज भी काशी में शिव के वाहन स्वछंद हर गली ,हर सड़क पर घूमते नजर आते हैं. भक्त उन्हें फल मिठाई अर्पण करते हैं. नंदी जी खुश होकर अपनी पेट पूजा करते हैं. उनके पास पेट पूजा व मस्ती करने के अलावा और कोई दूजा काम नहीं है . वे जब चाहें किसी को मार सकते हैं ,ट्राफिक बाधित कर सकते हैं .आगे आगे सांढ़ मस्ती से चल रहे हैं ,पीछे से कार आ रही है . सांढ़ को कोई परवाह नहीं है . कार वाला हीं सुयोग देखकर साइड से निकाल लेता है . यदि सुयोग नहीं मिला तो सांढ़ के पीछे पीछे चलने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं है .

काशी में एक मोहल्ला है लंका . लंका में जो पहले से रह रहे हैं ,वही रहते हैं.नया कोई नहीं रहना चाहता. कारण ,रावण की नगरी लंका थी . इसलिए सभी लोग गंगा के किनारे हीं रहना चाहते हैं .बिल्डर भी गंगा के किनारे के आस पास हीं कॉलोनियां बनाते हैं .परिवार के विघटित हो जाने पर भी लोग गंगा के किनारे हीं रहना चाहते हैं .परिवार बढ़ता है, पर जमीन उतनी हीं रहती है . मकान बन जाता है ,पर सीढ़ियों के लिए जगह नहीं बचती . इसलिए सीढ़ियां बेतरतीब बन जाती हैं . कहीं कहीं तो सीढ़ियों का उठान एक फीट तक का करना पड़ता है . कहते हैं कि जो काशी में मरेगा ,उसे मोक्ष मिलेगा . मोक्ष के लालच में लोग अपने मरणासन्न परिजनों को काशी लाते हैं . मकान भी गंगा के किनारे हीं किराये पर लेते हैं ताकि मरने पर दाह संस्कार करने में आसानी हो . इन बेतरतीब सीढ़ियों के कारण उन्हें अत्यंत परेशानी होती है .

काशी में अनेक सम्प्रदायों में बटे सन्यासी मिलेंगे. वैसे वस्तुत: दो मतों के सन्यासी हीं पाए जाते हैं . बैष्णव व शिव मतावलम्बी . चूंकि काशी शिव के त्रिशूल पर टिकी है और काशी में विश्व प्रसिद्ध विश्वनाथ(शंकर ) मंदिर है . अत: शैव मतावलम्बियों का यहां वर्चस्व है . बैष्णव मतावलम्बी भी कम नहीं है . स्वामी रामानंद व कबीर पंथी लोग वैष्णव सम्प्रदाय के हीं थे . कबीर ने लिखा है -

साकत मरें ,सन्त जन जीवैं.

भरि भरि राम रसायन पीवैं .

साकत से मतलब शक्ति या शिव के उपासक से था. इसलिए शैव व वैष्णव सम्प्रदाय में आये दिन क्लेश होते रहते थे . ये अक्सर त्रिशूल चिमटे से युद्ध करते थे ,जिससे काशी आने वाले लोगों को परेशानी होती थी . काशी के पंडे भी कम नहीं हैं . वे काशी आने वाले लोगों को धर्म के नाम पर लूटते हैं .सन्यासियों व पण्डों में विद्वता की जगह धूर्तता का समावेश हो गया है .

अत: काशी अने वाले लोगों को एक चेतावनी दी गयी है ..

रांड़ ,सांढ़, सीढ़ी ,सन्यासी ,

इनसे जो बचे तो सेवे काशी .

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