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सी.राजगोपालाचारी के हठधर्मिता के कारण तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन मुखर हुआ था

Bhola Tiwari Jun 18, 2019, 5:43 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

मणिशंकर अय्यर लिखते हैं साल 1833 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने ईसाई मिशनरियों को काबू में रखने वाली अपनी अकलमंदी भरी नीति को तिलांजलि दे दी।इसके बाद पूरे देश में मिशनरियों ने दक्षिण भारत को खासतौर से चुना।दक्षिण भारत में ईसाई मिशनरी गतिविधियों के उस दौर में दक्षिण भारत में ईसाई धार्मिक पर्चों और किताबों की बाढ़ सी आ गई थी।

1832 तक केवल तमिल भाषा में हीं 40 हजार से ज्यादा ईसाई धार्मिक पर्चे और किताबें छापे गए थे।1852 तक इनकी तादाद दो लाख दस हजार तक पहुंच गई थी।दक्षिण भारत में ईसाई मिशनरियों ने कितने बड़े पैमाने पर धावा बोला था,इसकी मिसाल ये है कि 1852 तक मद्रास में 1185 ईसाई मिशनरी स्कूल थे,जिनमें करीब 38,000 बच्चे पढ़ते थे।

मणिशंकर अय्यर आगे लिखते हैं कि जब हिंदूओं ने ईसाई धर्म के प्रचार- प्रसार का विरोध किया तो ईसाई मिशनरियों ने हिंदू देवी-देवताओं और उनकी आस्था का अपमान किया।उनके बारे में दुष्प्रचार भी किया गया।

ईसाई मिशनरियों के इस धार्मिक हमले के खिलाफ दक्षिण भारत में ब्राह्मण बुद्धिजीवियों की अगुवाई में एक बडा तबका एकजुट हुआ था।ये वो ब्राह्मण बुद्धिजीवी थे,जिन्होंने वेदों का गहराई से अध्ययन किया था।वो पुराणों के भी अध्येता थे और उन्हें "आदि शंकराचार्य" के अद्वैत दर्शन की भी गहरी समझ थी।इसके अलावा ये ब्राह्मण समुदाय अंग्रेजी भाषा भी अच्छी तरह से बोल और समझ लेता था।कुल मिलाकर ईसाई मिशनरियों का विरोध करने वाले ब्राह्मण वो लोग थे जो भारतीय संस्कारों से अच्छी तरह से परिचित थे और यूरोपीय-अंग्रेज विचारों से भी वाकिफ थे।ब्राह्मण समुदाय दक्षिण भारत में ईसाई मिशनरियों के खिलाफ आवाज उठाने लगा।

मणिशंकर अय्यर आगे लिखते हैं ब्राह्मणों का मकसद उन परंपराओं और आस्थाओं को बचाना था,जिन्हें वो "प्रमाणिक हिंदू परंपरा" और जीवन पद्धति मानते थे।उनके विचारों का श्रोत आर्यों के संस्कृत के ग्रंथ थे।ईसाई मिशनरियों के विरोधी इन ब्राह्मणों ने परंपरा और आस्था के नाम पर समाज पर अपने ऊँचे दर्जे वाली पकड़ बनाए रखने की कोशिश की।

1892 से 1904 के बीच जो सोलह भारतीय आईसीएस चुने गए थे उनमें से 15 ब्राहमण थे।इंजीनियरिंग की पढाई पास करने वाले 27 भारतीयों में से 21 ब्राह्मण थे।बीसवीं सदी के आगाज के वक्त मद्रास यूनिवर्सिटी के 67% ग्रेजुएट ब्राह्मण होते थे।सरकारी नौकरियों में उनका बोलबाला था,सचिवालय और ज्यादातर जिलों के प्रशासन में ब्राह्मणों का हीं दबदबा था।मद्रास हाईकोर्ट और बार में ज्यादातर ब्राह्मण हीं जज और वकील थे।बड़े बड़े पत्रकार ब्राहमण हीं होते थे।

इस दबदबे के खिलाफ इंकलाब तो आना हीं था।इसमें ज्यादा देर नहीं लगी।1916 में टी.एम.नायर और पिट्टी त्यागराज चेट्टी ने कांग्रेस से बगावत करके अपना "गैर ब्राहमण घोषणापत्र" जारी किया और फिर संपूर्ण तमिलनाडु में ब्राहमण, संस्कृत और हिंदी का विरोध शुरू हो गया।

ब्राहमणों ने जो आंदोलन ईसाई मिशनरियों के खिलाफ छेडा था अब उसे अपनों के हीं विरोध का सामना करना पड़ रहा था।इसी बीच 1937 में मद्रास प्रेसिडेंसी के मुख्यमंत्री ब्राहमण नेता सी.राजगोपालाचारी चुने गए।मुख्यमंत्री ने प्रेसीडेंसी के सभी सेकेंडरी स्कूलों में हिंदी पढ़ने वाला एक सरकारी फरमान जारी कर दिया।इस सरकारी आदेश ने हिंदी विरोध के आंदोलन को मानों हवा दे दी।हिंदी के खिलाफ तमिलों का आंदोलन 1937-40 तक जारी रहा।इस आंदोलन ने ईसाई मिशनरियों के विरुद्ध आंदोलन को भी भुला दिया।सी.राजगोपालाचारी के एक हठ ने तमिलनाडु में हिंदी और संस्कृत का लगभग सफाया हीं कर दिया।

मणिशंकर अय्यर विवादास्पद व्यक्ति जरूर हैं मगर उनकी विद्वता पर किसी को शक नहीं है।आपके पिता चार्टर्ड अकाउंटेंट थे,माँ काँलेज में लेक्चरर थीं।आपने प्रतिष्ठित आईएफएस से नौकरी शुरू की और 27 साल नौकरी करने के बाद 1989 में राजीव गांधी के कहने पर आप कांग्रेस में शामिल हुए।आप केन्द्रीय मंत्री भी रह चुके हैं।

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