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अंधेरी भयावह काली रात का सच इमरजेंसी

Bhola Tiwari Jun 18, 2019, 6:17 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

26 जून की सुबह जब देश ने आँख खोला तो पता लगा कि देश में आपातकाल लग चुका है।लोकनायक जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई समेत सौकड़ों विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया है।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने संदेश में कहा," जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं तभी से मेरे खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही है।"

इमेरजेंसी की घोषणा के बाद सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव और संसदीय चुनाव स्थगित कर दिए गए तथा नागरिक अधिकारों को भी सीमित कर दिया गया था।

साल 1971 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में बांग्लादेश की उत्पत्ति हुई थी उस समय उनकी लोकप्रियता चरम पे थी मगर घरेलू मोर्चे पर वो बेरोजगारी, भष्टाचार, अराजकता रोकने में असफल थीं,जिस गरीबी हटाओ का नारा देकर वो सत्ता में आईं थीं वो नारा नकारा साबित हो रहा था।देश में व्याप्त भ्रष्टाचार और महंगाई ने जनता को सरकार के विरोध में आंदोलन खड़ा करने को मजबूर कर दिया।जयप्रकाश नारायण के रूप में एक बेहद ईमानदार और गाँधीवादी नेता जो एक समय इंदिरा गांधी के बेहद करीब थे ने क्रांति का बिगुल बजा दिया।देश में सबसे पहले ये आंदोलन गुजरात में शुरू हुआ,छात्रों के आंदोलन से शुरू हुआ ये आग कुछ हीं दिनों में संपूर्ण गुजरात को अपने चपेट में ले लिया।छात्रों के बुलावे पर जयप्रकाश नारायण वहाँ गए और चिमन भाई मेहता की सरकार को खूब कोसा।गुजरात के आंदोलन में संपूर्ण गुजरात जल उठा,डरे सहमे केन्द्रीय नेतृत्व को चिमन भाई मेहता को मुख्यमंत्री पद से हटाना पडा।लेकिन तब तक ये आँच बिहार तक पहुंच चुकी थी।बिहार में छात्र आंदोलित थे वे अब्दुल गफूर की सरकार को एक मिनट झेलने को तैयार न थे।गाँधी मैदान की रैली में जेपी ने गफूर सरकार से इस्तीफा माँगा तो फिर फिजा हीं बदल गई।छात्र राजनीति में लालू प्रसाद यादव,नीतीश कुमार, रविशंकर प्रसाद आदि नेताओं ने बढचढ कर भाग लिया और कांग्रेस नेतृत्व को हिलाकर रख दिया।

इसी बीच देश की राजनीति को झकझोरने वाली एक घटना घटी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी को साल 1971 के लोकसभा चुनाव में धांधली करने का दोषी पाया और उनपर कोई भी पद संभालने पर छह साल का प्रतिबंध लगा दिया।चुनाव में पराजित समाजवादी नेता राजनरायन ने हाईकोर्ट में चुनावी परिणाम को चुनौती दी थी।उनकी दलील थी कि इंदिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया, तय सीमा से अधिक खर्चे किएं, मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए पैसे धडल्ले से बाँटें गए।हाईकोर्ट के विद्वान न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने आरोपों को सही पाया और इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर दिया।जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने कहा कि जब इंदिरा गांधी अदालत में पहुँचें तो कोई उनका अभिवादन नहीं करेगा,कोई भी उनके सम्मान में खड़ा नहीं होगा और ऐसा हीं हुआ।इंदिरा गांधी के सिपहसालारों को भान हो गया था कि फैसला उनके विरुद्ध आ सकता है।जस्टिस सिन्हा को अनेकों प्रलोभन दिए गए, सिन्हा के एक रिश्तेदार के माध्यम से उन्हें ये संदेश भिजवाया गया कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के लिए नामित कर लिया जाएगा अगर फैसला इंदिरा गांधी के पक्ष में हुआ तो।मगर बेहद कड़क और अनुशासनप्रिय न्याधीश ने मना कर दिया।

दंभ में चूर इंदिरा गांधी ने हाईकोर्ट के आदेश को मानने से मना कर दिया।24 जून 1975 को सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस कृष्ण अय्यर ने भी इस आदेश को बरकरार रखा लेकिन इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने की इजाजत दे दी।सुप्रीमकोर्ट के इसी आदेश का फायदा उठाकर इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 की मध्यरात्रि में संपूर्ण देश में इमरजेंसी की घोषणा कर दी।यह आपातकाल आंतरिक अशांति के कारण अनुच्छेद 352 के अंतर्गत लगाया गया था।केन्द्रीय कैबिनेट के प्रस्ताव पर तत्कालीन राष्ट्रपति फकरुद्दीन अली अहमद ने तुरंत हस्ताक्षर कर दिये थे।

इंदिरा गांधी के इमेरजेंसी के फैसले के बाद दो ऐसे बडे़ कारण रहे जिन्होंने इंदिरा गांधी के खिलाफ भारत में एक माहौल तैयार किया।पहला कारण था नसबंदी और दूसरा मीडिया पर सेंसरशिप।दरअसल इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी चीन में सफलतापूर्वक चल रहे जनसंख्या नियंत्रण कानून से बेहद प्रभावित थे,ये कानून भारत में भी लागू किया जाने लगा।सरकारी डाक्टरों, नर्सों और मेडिकल स्टाफ को टारगेट दिए जाने लगें, लोगों को जबर्दस्ती पकड़ कर नसबंदी की जाने लगी।टारगेट पूरा करने के लिए कुवांरे लोगों की भी नसबंदी के अनेकों मामले सामने आए।सभी नागरिकों में रोष था लेकिन मुसलमान कांग्रेसी हुकूमत से बेहद खफा थे उनका कहना था कि उनके धर्म में नसबंदी नाजायज है और वे सरकार के इस अलोकतांत्रिक निर्णय की खुलेआम आलोचना करते हैं और वे इस काले कानून को नहीं मानेंगे।

प्रेस पर सेंसरशिप लागू हो गया था, अखबार को सख्त चेतावनी दी गई थी कि वो सरकार के विरुद्ध कोई भी समाचार प्रकाशित न करें।एक समाचार पत्र ने तो विरोध स्वरूप पहले पन्ने को काले रंग से प्रकाशित किया था।

आपातकाल के समय इंद्र कुमार गुजराल सूचना एंव प्रसारण राज्य मंत्री थे उन्होंने संजय गांधी के कई अलोकतांत्रिक निर्णयों को मानने से इंकार कर दिया था तो उनको हटाकर संजय गांधी के वफादार वीसी शुक्ल को सूचना एंव प्रसारण मंत्री बनाया गया।वे अखबार और सिनेमा दोनों पर बेहद सख्त थे।उन दिनों अमृत नाहटा की फिल्म "किस्सा कुर्सी का" प्रर्दशित होने वाली थी कहीं से सूचना मिली कि इस फिल्म में इंदिरा की छवि को धूलधूसरित करने की कोशिश की गई है।शुक्ला के आदेश पर छापामार कर रीलों को जलाया जाने लगा,नाहटा को विभिन्न ऐजेंसियों ने बुरी तरह प्रताडित किया।गायक किशोर कुमार को कहा गया था कि वे इंदिरा गांधी के सम्मान में गाना गाएँ मगर उन्होंने साफ इंकार कर दिया तो उनके घरों पर इनकमटैक्स के छापे डाले गए।

एक अनुमान के अनुसार लगभग एक लाख लोगों को बिना मुकदमा दायर किये जेल में ठुस डाले गए, जेल में जगह की बेहद कमी थी अस्थायी जेलों में क्षमता से अधिक लोग बंद थे जिनमें समाज के सभी वर्गों के लोग शामिल थे।प्रमुख विपक्षी नेताओं में जयप्रकाश नरायण,विजया राजे सिंधिया, राजनरायन, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह,कृपलानी, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, सत्येंद्र नरायन सिन्हा, जार्ज फर्नांडीज, मधु लियमे,ज्योति बसु, समर गुहा, चंद्रशेखर, बाला साहेब देवरस और बडी संख्या में सांसद और विधायक शामिल थे।आपातकाल लागू होते हीं आंतरिक सुरक्षा कानून या मीसा के तहत लोगों को गिरफ्तार किया गया।गिरफ्तारी पहले होती थी बाद में उन्हें मौखिक आरोप बतलाये जाते थे अधिकांश मामलों में वो भी नहीं।

आपातकाल हमारे देश में 26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक लागू रहा।इतने हीं दिनों में जनता इंदिरा गांधी और कांग्रेस पार्टी से बेहद दूर चली गई।साल 1977 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी की बुरी तरह हार हुई और आजादी के बाद पहली बार मोरारजी देसाई के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सरकार ने सत्ता संभाला।

आपातकाल सिर्फ इंदिरा गांधी और संजय गांधी के दंभ का परिणाम था,संजय गांधी के बारे में कहा जाता है कि वो कभी किसी से सम्मानपूर्वक बात नहीं करते थे,भारतीय जनता ने इंदिरा गांधी को सत्ता से हटाकर उनके घमंड को चकनाचूर कर दिया था।

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