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ताकि बच्चा आखिरी दिन अपनी आँखों से दुनिया देख ले

Bhola Tiwari Jun 18, 2019, 5:23 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा

(जाने माने चिकित्सक नार्वे)

आज अपने पुराने मरीजों के केस छाँट रहा था, एक लेक्चर के चक्कर में, तो एक नौ साल के बच्चे का दिल मिल गया, जो मेरे जीवन के सबसे कठिन केस में से है। 

यह बच्चा एक अजीब सी दिल की बीमारी लेकर आया, जिसमें पूरे हृदय की संरचना ही विचित्र थी, समझ से बाहर थी। आखिर मैनें (और मशीन नें) एक 3-D मॉडल बना के पूरी गुत्थी सुलझाई। 

हमारे सर्जन बड़े मशहूर थे, और कई ऐसे केस ऑपरेट कर चुके थे, पर मेरे साथ केस देखकर वो मुझे बच्चे के पास ले गए। ऐसे मरीज 'वाजपेयी योजना' के तहत गाँव वगैरा से आते थे और उनके रहने का इंतजाम पास एक फ्लैट में होता। बच्चे के पिता कम उम्र में ही दिल की बीमारी से मरे थे, दादा साथ थे। सर्जन साहब ने उसके दादा को कन्नड़ में कहा कि बच्चे को लेकर किसी मंदिर हो आओ, केस पेचीदा है, कोशिश तो करेंगें ही। 

वो सर्जरी से पहले नमाज पढ़ते थे, बड़े कर्मकांडी मुसलमान थे। उन्होनें दादा से पूछा कि कौन से मंदिर ले गए? दादा ने कहा कि मंदिर जाकर क्या होगा? अब आप ही भगवान हैं। उन्होनें मुझे अंग्रेजी में कहा कि मैं मजाक नहीं कर रहा। मैं अंदर एक नस को बाँधने की कोशिश करूँगा। अगर उस समय बच्चा झेल गया तो बच जाएगा, लेकिन वो ख़ुदा पर डिपेंड करता है। 50-50 का मामला है। खैर!

बड़े ताम-झाम से सर्जरी हुई। मुझे भी इमेज़ के साथ थिएटर में रहने कहा। मेरा पहला हृदय सर्जरी का अनुभव था। करीब ६ घंटे गुजर गए, खड़े-खड़े टाँग अकड़ गई। आखिर वो नस बाँधने का वक्त आया, और बच्चा ऑन-टेबल खत्म। आप एक सर्जन के चेहरे का बदलता रंग देखेंगें, उसमें एक अजीब विवशता दिखने लगती है। एक ग्लानि। जैसे सब कुछ उनकी गलती से हुआ। वो वहीं बैठ गए और हम दोनों के आगे बच्चे का हँसता चेहरा घूम गया। डॉक्टर साहब अब दुबई के बड़े हस्पताल में हैं। साल भर पहले लिंक्ड-इन पर मिले तो इधर-उधर की बात के बाद पूछा, तुम्हें वो बच्चा याद है? हम दोनों भूल नहीं पा रहे। हमारे मष्तिष्क में पता नहीं ऐसे कितने बच्चे हमेशा के लिए प्लांट हो जाएँगें। 

एक मराठी मूवी है 'श्वास' जिसमें छोटे-मोटे किरदार मेरे पूना के डॉक्टर मित्रों ने भी निभाए। फिल्म ऑस्कर के लिए भी गई। उसमें बच्चे के ऐसा ऑपरेशन होना था, जिससे वो हमेशा के लिए अंधा हो जाएगा, पर जान बच जाएगी। बच्चे का दादा ऑपरेशन से पहले भाग जाता है। सर्जन नाराज हो जाते हैं। अचानक ठीक ऑपरेशन के वक्त लौट आता है और कहता है, बच्चे को मेला घुमाने ले गया था कि आखिरी दिन अपनी आँखों से दुनिया देख ले।

मैनें उस दिल की बीमारी के बच्चे का दिल आज भी संजो कर रखा है, पर इसका करूँ क्या? प्रेजेंटेशन-लेक्चर देते वक्त वह बस एक केस बनकर रहेगा, और लोग डिस्कस करेंगें, मैं लेजर-प्वाइंटर से उसकी कहानी बड़े निर्मोही भाव से सुनाऊँगा। 

बच्चे का दिल इस लिंक पर है, और मेडिकल कहानी भी। अब वैसे भी यही एक निशानी बची है मेरे पास। इसमें एक रंगीन दिल का मॉडल है, जिसके रंग मैनें अपने हाथों से कम्प्यूटर पर खूब शौक से भरे थे, जब वो धड़कता था।

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