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धड़क जाए गीतों की दुनियां जो कोई शब्द सजा दे

Bhola Tiwari Jun 17, 2019, 7:36 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

बोल खूबसूरत हों तो गीतों में चार चांद लग जाते हैं । सबसे अहम चीज भाषा होती है । भाषा शब्दों से बनती है । शब्द गीतों के लिए उपहार होते हैं । कुछ शब्द ऐसे होते हैं , जिन्हें लाख जतन करें वे हटते नहीं हैं , वे डटे रहते हैं । उनके एवज में कोई दूसरा शब्द वहां फिट हीं नहीं बैठता । शब्दों की बाजीगरी में जिसको महारत हासिल हो गयी वह गीत रचने में माहिर हो जाता है । कौन बात कैसे कही जा रही है , क्यों कही जा रही है और इसका औचित्य क्या है ? यह समझ में आने के बाद हीं गीत दिलों में उतरती है। 

गीतकार समीर ने एक इण्टरव्यू में कहा था - गीत रचने के लिए बहुत ज्यादा पढ़ना पड़ता है । अच्छा बुरा कुछ भी । पढ़ने से शब्द सामर्थ्य बढ़ता है । आप गीतों में उचित शब्द पिरो सकते हैं । आपको पता चलेगा कि केवल तुकबंदी करने से गीत की आत्मा मर सकती है । इसके अतिरिक्त प्रतिभा का होना भी नितांत आवश्यक है । प्रतिभा हर क्षेत्र में चाहिए । इतना होने के बावजूद अगर आप में प्रतिभा नहीं है तो आप चाहकर भी गीतकार नहीं बन सकते । लगन और परिश्रम केवल आपको आगे बढ़ने में मदद करेंगे । हिंदी फिल्मों में गीतों का प्रचलन पहली बोलती फिल्म "आलम आरा " से शुरु हुई थी । तब से आज तक फिल्मों में गीतों का कारवां निरंतर जारी है । उस दौर में गीतकार कमर जलालावादी , भरत व्यास , हसन कमाल , एस एच विहारी , असद भोपाली , पंडित नरेंद्र शर्मा और खुमार बाराबंकवी की धूम थी । इनका शब्द सामर्थ्य और भाषा पर पकड़ गजब की थी ।

 कविवर प्रदीप ने देश प्रेम से ओत प्रोत गीत लिखकर फिल्मी दुनियां में अपनी भाषा और शब्दों के नायाब जादू का सिक्का चला दिया था । उनके लिखे गीत "दूर हटो ऐ दुनियां वालों ", " चल चल रे नव जवान ", "आओ बच्चों तुम्हें दिखाऊं,,," और " दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल " काल जयी गीत साबित हुए । उनके लिखे गीत " ऐ मेरे वतन के लोगों ,, "को लता ने इस कदर गाया था कि नेहरु जी रो पड़े थे । यह गीत पाकिस्तानी भी सुनते हैं । उन्हें भी यह गीत जज्बाती बना देती है । गीतकार शैलेंद्र की भी भाषा पर पूर्ण अधिकार था । भाषा में सादगी और गहरायी थी । शब्दों का चयन ऐसा था कि आप कह नहीं सकते कि अमुक गीत में अमुक शब्द जंच नहीं रहा है । उनके लिखे गीत " आवारा हूं " और " मेरा जूता है जापानी " देश क्या विदेशों में भी बहुत लोकप्रिय हुए थे ।शैलेन्द्र को फिल्मों में लाने वाले राज कपूर थे ।

पहचान की ख्वाहिश से अछूते गोपाल दास नीरज का कैरियर मात्र पांच साल का था । नीरज जब तक फिल्मी दुनियां में रहे अपनी शर्तों पर रहे । उनका कहना था कि पहले धुन बन जाएगी तो हमें गीत धुन के अनुसार बनानी पड़ेगी । ऐसे में हम अपना सर्वश्रेष्ठ गीतों को दे नहीं पाएंगे । हम एक सीमा विशेष में बंध जाएंगे । इसलिए उन्होंने जो लिखा अपने हिसाब से लिखा । बाद में संगीतकार धुन बनाते रहे । "ऐ भाई जरा देख के चलो " गीत पर राजकपूर को धुन बनाना आसान नहीं दिखा तो उन्होंने यह काम नीरज को हीं सौंप दिया । नीरज ने गाकर बताया तब संगीतकार ने उस पर संगीत दिया । उनके लिखे गीत "कारवां गुजर गया ," लिखे जो खत तुझे " रंगीला रे ,,," फूलों के रंग से " मेघा छाए आधी रात " आदि बहुत लोकप्रिय हुए थे । संगीतकार एस डी वर्मन और जयकिशन के गुजरने के बाद नीरज ने वाॅलीवुड छोड़ दिया था ।

गीतकार आनंद बख्शी ने फिल्मों में तकरीबन चार हजार गाने लिखे थे । उन दिनों आनंद बख्शी और लक्ष्मी कांत प्यारे लाल की जोड़ी हिट थी । उनके लिखे गीतों में " कुछ तो लोग कहेंगे " , " दम मारो दम " , " तुझे देखा तो ये जाना सनम " आदि प्रमुख हैं । कई प्रसिद्ध गायकों के कैरियर का पहला गाना आनंद बख्शी साहब ने हीं लिखा था । आनंद बख्शी साहब को हर बार यह भान होता कि वे अब चूक गये हैं । अब वे गीत नहीं लिख पाएंगे । लेकिन वे हर बार और उम्दा गीत लिख देते थे । प्रसून जोशी नये गीत कारों में सबसे अहम गीतकार हैं । फिल्म तारें जमीं पर के गीत " मां , ,,, " के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरष्कार मिला है । गीतकार जावेद अख्तर भी बहुत अच्छे गीतकार हैं । उनके लिखे गीत " एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा " , " देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए " , " एक दो तीन चार ,,," आदि गीत बहुत हीं हिट हुए थे । एक बार गुलजार से एक इण्टरव्यू में उनके पांच पसंददीदा गीतकारों के नाम पूछे गये थे । गुलजार ने जो नाम बताए , उनमें जावेद अख्तर का नाम नहीं था । जावेद अख्तर ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी कि जब गुलजार जैसा गीतकार मुझे अपने पांच पसंददीदा गीतकारों में जगह नहीं देता तो इसका मतलब यह हुआ कि मुझे और ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी ।

गीतकार गुलजार ने फिल्म वंदिनी के गीत " मेरा गोर रंग लई ले " से गीतकार के रुप में अपना फिल्मी सफर शुरु किया था । आज वे बूढ़े हो चले हैं , पर उनके गीतों का सफर खत्म नहीं हुआ है । वे आज भी " कजरारे कजरारे " भेजा शोर करता है " और " छई छपाक " वाले जवानों के गीत लिखते हैं । कभी " हमने देखी है इन आंखों की महकती खूशबू " और " नाम गुम जाएगा " जैसे संजीदा गाने भी लिखे थे । गुलजार को छः या सात बार फिल्म फेयर एवार्ड मिल चुका है । उन्हें अपने गीत " जय हो " के लिए आस्कर एवार्ड भी मिल चुका है । गुलजार एक कवि भी हैं । वे गीतकार के रुप में अपना सिक्का पहले हीं जमा चुके हैं । मेरे ख्याल में कवि बिना कीमत का जायदाद होता है , पर गीतकार अपनी कीमत वसूलना जानता है । गुलजार ने अपनी कीमत पहचानी है और कवि और गीतकार में एक अच्छा समन्यव स्थापित किया है । आशा है भविष्य में ऐसे गीतकार और बनेंगे ।

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