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नन्हीं जान को ऊँचे हैंडल-बार पर लटका कर कहते हैं- ‘जम्प !’

Bhola Tiwari Jun 17, 2019, 7:24 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा

(जाने माने चिकित्सक नार्वे)

कल बच्चों को एक घर में न्यौता मिला। शाम को जब लेने पहुँचे, सारे बच्चे लहुलूहान धूल-धूसरित। हमें बड़ी कोफ़्त हुई कि जब बच्चे संभाल नहीं सकते, तो बुलाते क्यों हैं? पता लगा इन नाजुक बच्चियों को पहाड़ों पर चढ़ा दिया। दो पहाड़ों के बीच एक रस्सी पर लटक कर दूसरी ओर ले गए। वो गिरते, फिर भी आगे ले जाते। और यह कोई कमांडो-प्रशिक्षण नहीं, यह तो एक स्कॉटिश महिला के बेटे के घर पहली-दूसरी कक्षा के बच्चों का जमावड़ा था। सभी फूलकुमारियों को सजा-धजा भेजा था, और मिट्टी में लोटती वापस मिली।

बैंगलूर में गर बेटी कभी स्कूल में हल्की चोट भी खाती, तो फ़ोन आ जाता। माफी मांगी जाती। गर न मांगते, तो अभिभावक सर पर चढ़ जाते। लड़कों का फिर भी थोड़ा-मोड़ा चलता है। बेटियाँ उम्र के साथ अपना शरीर बचाना सीखने लगती है। यूँ ही पहाड़ से नहीं कूद जाती। तमाम फ़िटनेस-फ्रीक भी यह तो चाहती ही हैं कि चेहरा बचा रहे, मुँह न फूट जाए। यहाँ तो यह रोज का ही ड्रामा है। जब स्कूल पहुँचो, बच्चे मिट्टी में लोटते ही नजर आएँगे। पेड़ पर लटके। कभी जंगल से लौटे। कभी पानी में कूद तैरते। कुछ हो गया तो? किसी को फिक्र ही नहीं।

मैंने आईसलैंड में ऐसी ही अजीब बात देखी-सुनी, किताब में लिखी भी। वहाँ दो-तीन वर्ष की बच्ची को ऊँचे हैंडल-बार पर लटका कर कहते हैं- ‘जम्प!’। यह वो रोज ही कराते हैं। बच्ची रोती है, पर फिर से चढ़ाते हैं। धीरे-धीरे वो इस चोट की परवाह बंद कर देती है। और वो कुछ भी कर जाती है। 

अब यह बुरी आदत मुझे भी लग गयी है। बच्ची गिरती है, तो हाथ देकर नहीं उठाता, दुलार नहीं करता। उसे उठने देता हूँ। मैं मूक देखता रहता हूँ। वो भी यह सीख जाती है कि उसके हर छोटे-मोटे गिरने पर उठाने वाला हाथ उसके पिता का भी नहीं। कभी हक से दुलार मांग लिया तो मांग लिया।

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