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अवैध घुसपैठिए और पश्चिम बंगाल

Bhola Tiwari Jun 16, 2019, 8:07 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

बांग्लादेश के उदय के पहले से हीं पाकिस्तानी सेना के अत्याचार से परेशान बांग्लादेशी नागरिकों का भारत में आना शुरू हो गया था।

पाकिस्तान में साल 1970 के आम चुनाव में पूर्वी क्षेत्र में शेख मुजीबुर्रहमान की पार्टी ने जबरदस्त जीत हासिल की थी,अपने कुछ दक्षिण क्षेत्र के सहयोगियों के साथ मुजीबुर्रहमान ने संसद में विश्वास मत हासिल कर लिया।शेख मुजीबुर्रहमान को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनना तय था लेकिन दक्षिण क्षेत्र के नेता और फौजी जनरल इस बात को पचा नहीं पा रहे थे कि कोई बांग्ला बोलने वाला और पूर्वी क्षेत्र का नेता प्रधानमंत्री बने।साजिशें चरम पर थीं शेख मुजीबुर्रहमान को देश द्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया यही बांग्लादेश के उदय का कारण बना।

साल 1971 में राष्ट्रपति जनरल याहया खान ने जनरल टिक्का खान को पूर्व में फैली नाराजगी को दूर करने के लिए जिम्मेदार सौंपी।बताते हैं कि जनरल टिक्का खान बहुत जल्द हीं नागरिकों के आंदोलन, हड़ताल से उब गया और उसने सख्ती शुरू कर दी।पुलिस और प्रर्दशनकारियों के बीच रोज भिडंत होने लगी तकरीबन पुलिस और सेना आंदोलनकारियों पर फायरिंग करके उन्हें मारने लगी।हालात बद से बदतर होने लगे,पुलिस और सेना गाँवों, कस्बों में घुसकर औरतों के साथ जबरन बलात्कार करने लगी।यहीं से तकरीबन दस लाख लोग भारत पलायन किए।चूँकि भारत मुक्तिवाहिनी को समर्थन दे रहा था इस वजह से उसे शरणार्थियों को अपने देश में शरण देना पडा।तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पब्लिक मीटिंग और संसद में कहा कि क्रमबद्ध तरीके से बांग्लादेशी शरणार्थियों को वापस उनके देश भेजा जाएगा।बांग्लादेशी शरणार्थियों को अपने देश में शरण देना तत्कालीन परिस्थितियों में गलत था या सही था ये बहस का विषय हो सकता है।कुछ निर्णय एक विशेष कालखंड में परिस्थितियों के मद्देनजर लिए जातें हैं जिन्हें बाद में सही,गलत के चश्मे से देखना कहाँ तक उचित होगा ये एक ज्वलंत प्रश्न है।

तत्कालीन सरकार शरणार्थियों को वापस भेजने में बुरी तरह असफल रही तभी से असम के मूल निवासियों की मांग है कि उन्हें चिन्हित कर वापस उनके देश भेजे जाएं।असम के मूल निवासियों की ये माँग जायज भी है,किसी भी राज्य या देश का संशाधन सीमित है और उनको दोहन करने का सबसे पहला हक वहाँ के मूल निवासियों को है।

असम में इस मुद्दे पर समय समय पर बहुत से आंदोलन हो चुके हैं।कांग्रेस सरकार ने वहाँ के प्रबुद्ध वर्ग के लोगों के साथ नेशनल रजिस्टर आँफ सिटीजन(एनआरसी) बनाने के लिए समझौता भी किया मगर इसकी रफ्तार कछुए की तरह धीमी रही।सुप्रीमकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इसमें तेजी आई और इसे तैयार कर जारी किया गया।अभी इसमें बहुत सी खामियां हैं जिसे दूर किया जाएगा।बहुत से नागरिकों का नाम भूलवश छूट गया है, सरकार ने एक महीने का समय दिया है ताकि जिनका नाम छूट गया है वह अपना नाम दर्ज करा सके।

आपको बता दें अभी भी मात्र पाँच सौ रूपये में अवैध घुसपैठियों को भारत की सीमा में दाखिल कराया जाता है,ये सिलसिला सालों से बदस्तूर जारी है।असम सीमा पर एजेंट सक्रिय हैं जिनका यही काम है पैसे लेकर अवैध घुसपैठ कराना।ये काम कांग्रेस के शासनकाल में खूब फला फूला आज भी जब वहाँ भाजपा का शासन है अवैध घुसपैठ लगातार जारी है।

इस मामले पर सतही राजनीति शुरू हो गई है, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक विवादित बयान में कहा है कि,"स्थिति को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है इससे देश में रक्तपात, गृहयुद्ध होगा।"

आपको बता दें यही ममता बनर्जी हैं जो 2005 मे संसद में अवैध घुसपैठियों के मामले पर हंगामा किया था और लोकसभा अध्यक्ष के टेबल पर कागजों का पुलिंदा उछाल कर वाक आऊट किया था।उस समय वो विपक्ष में थीं आज सत्ता में हैं,परिस्थितियां बदल चुकी हैं निष्ठाएं बदल गएँ हैं।पहले वामपंथी दलों को बांग्लादेशी घुसपैठियों का वोट मिलता था जिस वजह से वे आंदोलित थीं आज तृणमूल कांग्रेस को वे सपोर्ट करते हैं।इस वजह से वे उनके पक्ष में ऊलजलूल बातें कर रहीं हैं जो निंदनीय है।किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को रक्तपात और गृहयुद्ध की धमकी देना राष्ट्रद्रोह से कम नहीं है ममता बनर्जी को समझना होगा।आज पश्चिम बंगाल और असम इन अवैध घुसपैठियों के बोझ से कराह रहा है,चंद वोटों की खातिर उनके नाम वोटर लिस्ट में डाले जा रहें हैं उनके नाम से राशनकार्ड, वोटर आईडी बनवाए जा रहें हैं।

बांग्लादेश सरकार ने अवैध घुसपैठियों के वापस बांग्लादेश भेजे जाने के संबंध में कहा है कि वे हमारे नागरिक नहीं है भारत को अपनी आंतरिक समस्या खुद हल करनी पड़ेगी।

गौरतलब है कि भारत हीं नहीं अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस आदि विकसित देश भी इस मामले से परेशान हैं वो भी इन्हें अपने देश से नहीं निकाल पा रहे अब देखना है कि इतनी बडी संख्या को भारत कैसे बांग्लादेश भेजेगा जबकि बांग्लादेश उन्हें अपना नागरिक मानने को तैयार नहीं है।

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