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स्त्री की बेइज्जती किसी भी यातना से ऊपर

Bhola Tiwari Jun 16, 2019, 6:50 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा

(जाने माने चिकित्सक नार्वे)

मुजफ्फरपुर मामले में मेरा पता नहीं, दिल सच को स्वीकार नहीं कर पा रहा। इसकी वजह यह भी है कि बिहार में बलात्कार की रिपोर्टिंग सदा से कम ही हुई है। बल्कि पूरे भारत में सबसे कम बलात्कार प्रतिशत उन राज्यों (यूपी-बिहार) में हैं जो दबंगई और जंगलराज के गढ़ कहे जाते रहे। वहाँ उठाईगिरी (उठा लेना), पकड़ौवा और सामंतवाद के समय रखैलगिरी अधिक थी, पर बलात्कार अपेक्षाकृत कम नजर आती। समाज में महिलाएँ घरों में बंद अधिक होती, नाइट-लाइफ़ कभी थी ही नहीं। पुरूषों की दबंगई पुरूषों से अधिक होती, महिलाओं को यूँ राह चलते बलात्कार कर देना अपराध के चरम पर भी कम ही था। इसके पीछे कृषि-प्रधान समाज भी हो सकता है, और पितृसत्तात्मक समाज भी। पर अमूमन किसी लड़की से बतियाना भी कठिन था। हाथ पकड़ना तो दूर की बात। कई वर्ष पहले एक गुंडे ने एक मेडिकल छात्रा को उठवा लिया था, लेकिन फिर विवाह कर दोनों सुखी रहे और वो अच्छी डॉक्टर बनी। यह कैसे रिश्ते थे, कहना कठिन है, लेकिन बड़े से बड़े दबंग की भी महिलाओं के मामले में घिघ्घी बँधती थी। किसी ने यूँ ही बस अड्डे पर छेड़ दिया, और लड़की पीछे मुड़ी तो इधर-उधर देखने लगे। वैसे यह पीछे मुड़ कर घूरने वाली लड़की भी किसी दबंग से ही जुड़ी होती, तो लोग डर जाते होंगे। मुस्लिम मुहल्लों से तो हिंदू दूर ही रहते कि वहाँ तो कुछ संभव नहीं। वैसे ही भूमिहार लड़के राजपूतों से न भिड़ते होंगे। दरअसल यह पता करना मुश्किल था कि जिसे छेड़ा जा रहा है, उसकी औकात क्या है? कई लड़के पिटते भी, समूह में। कुल मिला कर यह बातें इतनी आसाँ न थी, और लड़के-लड़की के बीच एक खासी दीवार थी जिसे भेदना कठिन था। 

मुजफ्फरपुर के एक घने मुहल्ले में यह सब चलता रहा, और किसी को खबर न हुई? वहाँ तो घर इतने चिपके और खिड़कियाँ ऐसी खुली होती हैं कि हमें यह भी पता होता है कि पति-पत्नी आपस में क्या बतिया रहे हैं। निजता कुछ होती है, यह कभी इल्म ही न हुआ। हर व्यक्ति दूसरे की दो मिनट में कुंडली निकाल दे। और उस कैम्पस के अंदर ही परिवार की बहू-बेटियाँ रह रही हैं, यह रिपोर्ट भी पढ़ी। तो क्या उन्हें भी इल्म न हुआ? इतना घाघ और चुप बिहार कभी न था। स्त्रियों से बात छुपना तो असंभव था। कौन सी लड़की क्या कर रही है, पूरे मुहल्ले को खबर होती।

मुझे एक आंतरिक भय का वातावरण लग रहा है कि गर लोग सब देख-सुन सालों चुप रह जाते हैं। हालिया चार्ल्स एंड्रयूज की एक पंक्ति पढ़ी जिसका अर्थ यह था कि हिंदुस्तानी तमाम यातनाएँ सह लेंगे लेकिन अगर कोई गोरा उनकी बहू-बेटियों को छू ले, वो उसे जान से मार देने में न हिचकेंगे। उनके लिए स्त्री की बेइज्जती किसी भी यातना से ऊपर है। गर सूक्ष्मता से देखें, तो यह सत्य भी है, ख़ास कर ग्राम्य और कृषि-प्रधान राज्यों में। जैसे बिहार में। यह घटना सच निकलेगी, तो यह एक अस्तित्व का समूल नाश होगा।

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