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सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नही, सूरत बदलनी चाहिए

Bhola Tiwari Jun 16, 2019, 6:27 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा  

हिंदी साहित्य ने बेशक मीर , ग़ालिब और फिराक़ न दिया हो , लेकिन दुष्यंत कुमार को दिया है ; जिनकी लोकप्रियता दिवंगत होने के बाद भी दिन ब दिन बढ़ रही है ।जय प्रकाश नारायण के समग्र क्रान्ति के समय इनके शेरों का हर भाषण में उद्धरण दिया जाता था और बेशुमार तालियां बजती थीं . संसद में इनके शेर हज़ारों बार पढ़े गए हैं . चूँकि दुष्यंत के लिखे शेर जनता के जुबान पर चढ़े हुए हैं , इसलिए मिडिया के लोग भी अपनी बातों में असर के लिए उनके शेर पढ़ा करते हैं . दुष्यंत के लेखन का स्वर सड़क से संसद तक गूंजा है . पहले हिंदी में अज्ञेय और मुक्तिबोध की क्लिष्ट और गूढ़ कवितायेँ हीं पढ़ी जाती थीं . आम आदमी के लिए त्रिलोचन शास्त्री , नागार्जुन और धूमिल बच गए थे . उसी समय दुष्यंत कुमार का हिंदी गज़ल में धूमकेतु की तरह आगमन हुआ. गज़ल की दुनियां में उन्होंने अपार सफलता पाई . हद तो तब हो गई जब दो विरोधी पार्टियां उनकी शेर की एक हीं पंक्ति अपने अपने चुनाव प्रचार में इस्तेमाल करने लगीं -

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं ,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए .

दुष्यंत कुमार ने अपनी ग़ज़लों में आम बोल चाल की उर्दू के ढेर सारे शब्दों का इस्तेमाल किया है . उनका कहना था कि उर्दू और हिंदी तभी तक अलग अलग हैं , जब तक कि दोनों अपने अपने सिंहासन पर विराजमान हैं . जब ये अपने सिंहासन से उतर आम आदमी की जुबान पर बैठती है तो यह फर्क करना मुश्किल हो जाता है कि कौन उर्दू और कौन हिंदी है?

यूँ तो दुष्यंत कुमार ने हर विधा - उपन्यास , कहानी , नाटक , काव्य पर अपनी लेखनी दौड़ाई है , पर इनकी ग़ज़लों की अपार और असीम लोकप्रियता ने इनके अन्य विधाओं को नेपथ्य में धकेल दिया है . दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों से मेरा पहला राफ्ता सन् 1976 में हुआ जब हिंदी साहित्य की पत्रिका सारिका में उनकी गज़ल छपी थी . गज़ल पढ़कर मैं उनका मुरीद बन गया . आप भी उस गज़ल के चन्द अशआर पढ़िए -

कहाँ तो तय था चरांगा हर घर के लिए .

अब मयस्सर नहीं शहर के लिए .

यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है ,

चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए .

   दुष्यंत नई पीढ़ी के ग़ज़लकार थे . उनकी ग़ज़लों में आम आदमी का गुस्सा और क्षोभ भरा हुआ है . मशहूर गज़लकार निदा फाजली ने लिखा है -

" दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी की नाराज़गी और गुस्से से सजी हुई है ," 

इलाहाबाद के दिनों में कमलेश्वर , मार्कण्डेय और दुष्यंत की त्रयी काफी मशहूर थी . इनकी दोस्ती का हीं नतीजा था कि दुष्यंत के बेटे की शादी कमलेश्वर की बेटी से हुआ . आरम्भ में दुष्यन्त परदेशी नाम से लिखा करते थे . उनका पूरा नाम दुष्यंत कुमार त्यागी था . वे काफी मनमौजी किस्म के इंसान थे . उनका मनमौजी पन उनके शेरों में सायास हीं झलकता है -

   कहीं पे धूप चादर विछा के बैठ गए .

   कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए .

           ये सोचकर कि दरख्तों में छाँव होती है ,

                यहाँ बबूल के साये में आके बैठ गए .

आकाश वाणी भोपाल में दुष्यंत कुमार का जब सहायक निदेशक पद पर नियुक्ति हुई तो उन्हें मजबूर होकर इलाहाबाद छोड़ना पड़ा . मुम्बई में कमलेश्वर फिल्मों की पटकथा लिखने लगे . मार्कण्डेय इलाहाबाद में हीं रूक गए . यह त्रयी टूट गई , पर इनके दिल जुड़े रहे . दुष्यंत के मरणोपरांत भी कमलेश्वर ने अपना फर्ज़ निभाया और अपनी बेटी का रिश्ता दुष्यंत के बेटे के साथ किया .

दुष्यंत के भोपाल वाले घर में साहित्यकारों का मजमा लगा रहता था , लेकिन उनकी सबसे बड़ी आलोचक उनकी पत्नी थीं . दुष्यंत सबसे पहले अपनी नई रचना अपनी पत्नी राजेश्वरी को दिखाते थे . उनको रचना अच्छी लगी तो प्रकाशन हेतु पत्रिकाओं को भेजा जाता ;अन्यथा आवश्यक कांट छांट और कतर व्योंत के बाद राजेश्वरी देवी को पुनः दिखाई जाती थी . हरी झण्डी मिलने पर हीं वह रचना छपती थी . राजेश्वरी देवी हिंदी की शिक्षिका थीं और साथ हीं एक सुधी पाठक भी . दुष्यंत कुमार का मात्र 42 साल की उम्र में हीं 30 दिसम्बर सन् 1975 में मौत हो गई थी .

दुष्यंत कुमार के मरने के बाद भोपाल में "दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय " खोला गया है , जिसमें उनकी बेहतरीन हस्तलिखित पांडुलिपियां रखी गई हैं . राजेश्वरी देवी ने एक खत इस स्मारक को मुहैय्या कराई है , जिसमें दुष्यंत ने अपने मरने से पहले अमिताभ बच्चन की दीवार फ़िल्म में की गई अभिनय की बड़ाई की है . एक बानगी देखिए -

  " मुझे क्या पता था कि उनकी ( हरिवंश राय बच्चन की ) एक सन्तान का कद इतना बड़ा हो जायेगा कि मैं उसे खत लिखूँगा और उसका प्रशंसक हो जाऊँगा ."

कान फेस्टिवल में प्रदर्शित और प्रशंसित फ़िल्म मसान में दुष्यंत की एक गज़ल ली गई है _

एक जंगल है तेरी आँखों में ;

मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ .

तू किसी रेल सी गुजरती है ,

मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ .

यह फ़िल्म कला फ़िल्म थी . इसलिए ज्यादा लोगों ने नहीं देखी , पर गज़ल श्रब्य है .

हिंदी में गज़ल लिखने की परम्परा निराला ने डाली , शेर सिंह 'जंग 'और बलबीर सिंह' रंग 'के समय यह परवान चढ़ी , लेकिन गज़ल साधने और उसकी पहचान हिंदी में जिसने कराई तो वह थे दुष्यंत कुमार । दुष्यंत ने गज़ल को आशिक और माशूका के संसार से बाहर निकाला और उसका जीवन के यथार्थ से साबका कराया . हमारे पेट में रोटी नहीं है तो हम ख़ुशी के गज़ल कैसे लिख सकते हैं . हमें बाध्य होकर रोटी पर गज़ल लिखनी पड़ेगी. हाँ , उन्होंने अपने एक शेर में इस बात की तस्दीक भी की है ~

पत्तों से चाहते हो कि बजें साज की तरह ,

पेड़ों से पहले आप उदासी तो लीजिये .

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