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जब दिल हीं टूट गया

Bhola Tiwari Jun 16, 2019, 6:08 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

के एल सहगल का पूरा नाम कुंदन लाल सहगल था ,जिनका जन्म 4 अप्रैल सन् 1904 को जम्मू के नवाशहर में हुआ था . उनके पिता अमरचन्द सहगल तहसीलदार थे . माता केशरीबाई कौर भजन अच्छा गाती थीं , जिनसे प्रभावित हो कर के एल सहगल का झुकाव गायन की तरफ हुआ . फ़िल्मी दुनिया में आने से पहले सहगल साहब ने कई छोटी मोटी नौकरियां की .फिल्मों में काफी संघर्ष के बाद आए .

   फ़िल्मी दुनियां में आने के बाद के एल सहगल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा . उनके गायन और अभिनय को लोगों ने हाथों हाथ लिया . 1930 से 1940 तक - एक दशक का समय के एल सहगल के नाम था . लोग उनके नाम पर उनकी फिल्में देखने जाते थे . फ़िल्म देवदास में उनके भाव प्रणय अभिनय को आज भी पुराने लोग याद करते हैं . उस दौर की उनकी प्रमुख फ़िल्में जो बॉक्स ऑफिस पर सुपर डुपर हिट रहीं थीं वो पुराण भगत (1933), देवदास (1936), सुरदास (1942) और तानसेन (1943) आदि थीं . के एल सहगल सच्चे अर्थों में उस दौर के पहले सुपर स्टार थे .

के एल सहगल का अभिनय बेजोड़ था , पर उनका गायन उनके अभिनय पर बीस पड़ता था . अपने बीस साल के फ़िल्मी कैरियर में के एल सहगल ने 36 फिल्मों में 143 गीत गाए . 42 के करीब गैर फ़िल्मी गाने गाए . इतनी कम फ़िल्में और सिर्फ 185 गाने गाकर हीं के एल सहगल हिंदी फ़िल्मी आकाश में धूमकेतु बन कर छा गए . उनकी गायन की लोकप्रियता का अंदाज़ इसी से चल जाता है कि रेडियो सीलोन से हाल तक सुबह सुबह उनके हीं गीत बजाए जाते थे . 

के एल सहगल बिना शराब पिए नहीं गाते थे . उनका मानना था कि शराब पीकर वे अपना वेहतर इल्म बाहर निकाल पाते हैं . इस मिथ्या धारणा को तोड़ा संगीत कार नौशाद ने .उन्होंने सहगल से बिना पिए फ़िल्म शाहजहाँ का वह कालजयी गीत गवाया , जिसके बोल थे " जब दिल हीं टूट गया .." . के एल सहगल की यह धारणा टूट गई . उन्होंने नौशाद से सिर्फ इतना कहा -" आप मुझे पहले क्यों नहीं मिले . अब काफी देर हो चुकी है . मैं शराब नहीं छोड़ सकता . "

के एल सहगल काफी उदार थे.जब उनका वेतन हाथ में आता था तो वे उसे जरूरत मन्दों में उसे बाँट देते थे .बचे खुचे पैसों की वे शराब पी जाते थे . एक बार उन्होंने एक विधवा को अपनी रत्नजड़ित अंगूठी दान कर दी थी .अब फ़िल्म निर्माता उनकी तनख्वाह सीधे उनके घर वालों को देने लगे थे और सहगल को पाकेट मनी मिलने लगी थी .

के एल सहगल ग़ालिब से काफी प्रभावित थे . उन्होंने ग़ालिब की तकरीबन 20 गजलें गाई होंगी . उन्होंने ग़ालिब की मजार का जीर्णोद्धार कराया था . उसी प्रकार उन्हें रबीन्द्र नाथ टैगोर की कविताओं से भी काफी लगाव था . उन्होंने रबीन्द्र संगीत भी गाया था.आज भी उनके गाए रबीन्द्र संगीत बंगाल के हर घर में बजते हैं .

के एल सहगल ने कभी किसी गुरु से गाना नहीं सीखा . एक बार वो उस जमाने के प्रसिद्ध गायक उस्ताद फैयाज खां से गायन सीखने गए . उन्हें राग दरबारी में गा कर सुनाया . फैयाज खां हत्प्रभ रह गए . हाथ जोड़ बोले - " मेरे पास इससे बेहतर आपको सिखाने के लिए कुछ नहीं है ."

के एल सहगल को खाने का बड़ा शौक था . वे अपने हाथ का बनाया हुआ मीट कबाब सभी को बड़े चाव से खिलाते थे . वे अक्सर गाने की रिकॉर्डिंग से पहले अचार , मुरब्बा और पकौड़े खा लिया करते थे . फिर भी उनका गला खराब नहीं होता था . उनके गले पर सरस्वती की कृपा थी .

के एल सहगल अपने आप पर भी हँसते थे .अपने आप पर हँसना सभी के लिए सम्भव नहीं हैं .वे गंजे थे .इसलिए बिग लगाकर अभिनय किया करते थे .एक बार हवा से उनका बिग उतर गया . सब हँस पड़े . सहगल भी खूब हँसे .

के एल सहगल ने अपने शर्तों पर गायन और अभिनय किया . कभी भी अश्लील गाने नहीं गाए . गानों पर रायल्टी लेने का चलन उन्हीं का शुरू किया हुआ है . इसके पहले प्रोड्यूसर गाने का मेहनताना दे कर अपने कर्तव्य का इति श्री समझ लेते थे .उनकी रखी इस नींव पर आज के गायक गायिकाएं लाभान्वित हो रहे हैं .

के एल सहगल के गाए गीत इंडोनेशिया , फिजी , मारीसस , श्रीलंका , ईरान , इराक़ , त्रिनिदाद और अफगानिस्तान आदि देशों में बड़े चाव से सुने जाते थे . आज भी कई देशों में 18 जनवरी को उनकी पुण्य तिथि पर जलसे किये जाते हैं .पाकिस्तान में जिला स्तर पर के एल सहगल के नाम पर कमेटियां बनी हुई हैं . उनकी याद में बकायदा वहाँ लंगर चलाये जाते हैं .

मुकेश और किशोर कुमार शुरू के दिनों में के एल सहगल से प्रभावित थे और वे उनकी हीं स्टाइल में गाने गाते थे . भारत रत्न और 50 हज़ार गाने गाने वाली गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज़ लता मंगेशकर उनकी इस कदर दीवानी थीं और उनसे वेपनाह मुहब्बत करती थीं कि उम्र का लम्बा फासला होते हुए भी वे के एल सहगल सेे शादी करना चाह रही थीं . और सहगल की मौत के बाद लता निशानी के तौर पे उनका हारमोनियम अपने पास रखना चाहती थीं , पर उनकी बेटी को भी उस हारमोनियम से उतना हीं मोह था . लिहाजा लता को उनकी अंगूठी पा कर हीं से संतोष करना पड़ा .

18 जनवरी सन् 1947 को मात्र 43 वर्ष की अवस्था में उनकी मृत्यु हो गई थी . उनकी अर्थी के साथ उनकी इच्छानुसार यह गीत बज रहा था -

जब दिल हीं टूट गया ,

हम जी कर क्या करेंगे ?

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