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एक भूल महाभूल

Bhola Tiwari Jun 15, 2019, 7:36 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव



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इस धरती पर हक सबका है कभी बहुत कुछ पाने के चक्कर में जो अपने पास होता है वो भी चला जाता है।यही हाल लाल कृष्ण आडवाणी के साथ हुआ।

04 जून 2005 आडवाणी पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ के विशेष आमंत्रण पर एक सप्ताह के यात्रा पर पाकिस्तान जातें हैं।वहाँ वे पाकिस्तान के "कायदे आजम" मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं और कहतें हैं कि जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे।उनका कहना था कि जिन्ना ने संविधान सभा में जो भाषण दिया था वह भारत की धर्मनिरपेक्षता की नीति से बिल्कुल मेल खाता है और वे मानते हैं कि जिन्ना भी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को मानते थे।उन्होंने कायदे आजम को एक अलग सख्शियत करार देते हुए कहा कि जिन्ना ने इतिहास बनाया था।

आपको बता दें कि उन्होंने पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में ये भी स्वीकार किया था कि उन्हें 06 दिसंबर 1992 की घटना पर खेद है।

उनके भारत आने से पहले प्रमोद महाजन ने सभी नेताओं को उनके दिये बयान की जानकारी दी, सभी नाराज थे।विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया।एक निजी टेलीविजन चैनल पर इंटरव्यू देते समय संघ के प्रवक्ता राम माघव ने कहा कि आडवाणी से बात की जाएगी।

जब आडवाणी का जहाज दिल्ली लैंड किया तभी उन्हें पता लग चुका था कि तीर तरकश से निकल चुकी है।नाराज लोगों ने "जिन्ना समर्थक वापस जाओ" के नारों से उनका स्वागत किया।उन्होंने विमानतल के बाहर पत्रकारों से वार्ता करके ये कह दिया कि वे अपने बयान पर कायम हैं।उन्होंने एक स्पष्टीकरण भी दिया कि उन्होंने बावरी मस्जिद विध्वंस पर कभी खेद प्रकट नहीं की,ये उनके बयानों को तोड मरोडकर प्रस्तुत किया जा रहा है।

खैर बवाल मचना हीं था और मचा भी।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के त्रीव विरोध पर उन्होंने 07 जून को अपना इस्तीफा पार्टी उपाध्यक्ष वेंकैया नायडू को सौंप दिया।जैसा कि परंपरा है बेमन से मनाने की कोशिशें की गई मगर आडवाणी नहीं माने।फिर राजनाथ सिंह की ताजपोशी हुई।

इन सब घटना चक्र के समय बाजपेयी जी बिल्कुल खामोश रहे।काफी दिनों के बाद एक बार उन्होंने आडवाणी का पक्ष लेते हुए कहा था कि आडवाणी जी के बातों को ठीक से समझा नहीं गया।लेकिन तब तक गंगा-जमुना का ढ़ेर सारा पानी बह चुका था।

दरअसल आडवाणी जी ने हीं भारतीय जनता पार्टी को दो सांसदों से 80 सांसदों तक पहुंचाया था मगर वो दौर गठबंधन का था।जब आडवाणी ने देखा कि उनके नाम पर सहयोगी दल इकठ्ठे नहीं होंगे तो उन्होंने मजबूरी में बाजपेयी जी का नाम आगे किया जिसपर सभी सहमत हो गए।

वे अच्छी तरह जान चुके थे कि कट्टरवादी इमेज के सहारे वे कभी भारत में गठबंधन के नेता बन नहीं पाएंगे।अपनी छवि सुधारने के लिए वे जिन्ना की मजार पे जाकर उन्हें धर्मनिरपेक्ष बता दिया मगर दाव उल्टा पड़ गया और जो कुछ उन्होंने इतने वर्षों से संजोया था एक झटके में मटियामेट हो गया।

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