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कहां से शुरुआत करेंगे और कहां करेंगे अंत

Bhola Tiwari Jun 15, 2019, 6:06 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा

(जाने माने चिकित्सक नार्वे)

नॉर्वे के स्कूल का मध्य-भारत के एक स्कूल से बहिनपा (सिस्टरहुड) है। दोनों के बच्चे आते-जाते रहते है। जब यहाँ के बच्चे वहाँ गए तो अब छोटा शहर है, बस से गोरी-गोरी लड़कियाँ निकली, लोग-बाग घेर कर फ़ोटो खींचने लगे। जैसे चिड़ियाघर में नए जानवर आ गए हों। कपड़े भी माशा-अल्लाह गर्मियों वाले यूरोपीय परिधान। जब शिकायत की, तो उन्हें समझाया गया कि यह भारत है, यूँ बाजार में न निकलें। संस्कृति का सम्मान करें। और वो जींस-पैंट और कमीज में कम से कम आ जाएँ। दिल्ली-बंबई होता, और बात थी। यह मैं पहले भी कह चुका हूँ कि हिंदुस्तानी बहूएँ भी यह हुनर खूब जानती हैं। विदेश से शॉर्ट्स में चली, दिल्ली तक जींस में आ गयी, और गांव जाते-जाते साड़ी में आ गयी। यह परिवेश का सम्मान है। इसमें अगर आप बदलने लगेंगे तो कहाँ से शुरूआत करेंगे और कहाँ अंत करेंगे? बात रूढ़िवादिता से अधिक विविधता की है। यह बात पक्की है कि जैसे-जैसे पाश्चात्यीकरण या वैश्वीकरण होगा, गाम के पोखरि (तालाब) किनारे भी बिकनी पहले आराम करते महिलाएँ मिलेंगी। पर यह मन में स्पष्ट हो कि हम वहाँ जाना चाह रहे हैं या नहीं। अंतर्द्वंद्व न हो। यह पूर्णतया वैयक्तिक निर्णय तो है ही कि कौन क्या पहनेगा, पर यह कुछ हद तक सामाजिक निर्णय भी है। और यही वजह है कि जो जिस देश में जाता है, उस भेष में रहता है। मेहमान की और बात है, पर फिर भी मेहमान सोचता है कि कुछ उस देश के कपड़े भी पहन लें। बनारस में गोरियाँ भारतीय परिधान में खूब मिलेंगी। तो अगर सुषमा स्वराज जी जितनी परिपक्व नेता ने अरबी देश में सर पर पल्लू बाँध लिया तो वो यह कर्तव्य ही निभा रही थी। किसी को यह नहीं पसंद आता तो मेहमान न बने, यह भी ठीक है। पर मेहमान बनें, तो यथासंभव मेहमानी निभाना भी उचित है।

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