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BIG NEWS : त्याग और बलिदान की मिसाल सिखों के 10वें गुरु गोबिंद सिंह, जिन्होंने खालसा पंथ की रखी नींव

Bhola Tiwari Jan 20, 2021, 2:05 PM IST टॉप न्यूज़
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सिद्धार्थ सौरभ

नई दिल्ली. : सिख धर्म के दसवें और अंतिम गुरु 'गुरु गोविंद सिंह' सिख धर्म के नवें 'गुरु तेगबहादुर' के पुत्र थे। जिस समय गुरु गोविंद सिंह का जन्म हुआ था, उस वक्त गुरु तेगबहादुर असम में थे। गुरु गोविंद सिंह का जन्म पटना में हुआ था। जब तेगबहादुर पटना पहुंचे तब तक गुरु गोविंद सिंह 4 वर्ष के हो चुके थे। गुरु तेगबहादुर ने यात्रा पर जाने से पहले ही अपने पुत्र के नाम का निर्णय कर लिया था। इसलिए गुरु गोविंद सिंह के बचपन का नाम 'गोविंद राय' था। बचपन से ही गोविंद राय का स्वभाव अपने हमउम्र बच्चों अलग थे। जब बच्चे खिलौनों से खेला करते थे, उस समय गोविंद राय तलवार, कटार और धनुष चलाना सीख रहे थे। उनके पिता सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर और माता का नाम गुजरी थी, जिन्होंने मुगल शासक औरंगजेब के खिलाफ धर्म रक्षा के लिए जंग छेड़ रखी थी। पटना के जिस घर में गुरु गोविंद का जन्म हुआ था और जहां उन्होंने अपने शुरुआती 4 साल बिताये थे, वहीं पर अब तख्त श्री पटना साहिब स्थित है।

 जहाँ एक तरफ गुरु तेग़ बहादुर, अपने काल में चारो तरफ शांति का पैगाम फैला रहे थे, वही दूसरी तरफ औरंगजेब किसी भी धर्म को अपने से ऊपर नहीं देखना चाहता था। इस कारण उस वक़्त हिंदुओं और सिखों के जबरन धर्मांतरण हो रहे थे और उनके मंदिरों को तोड़ा जा रहा था, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया जा रहा था और गुरु इन हादसों से बहुत दुखी थे क्योंकि उन्हें ऐसा लग रहा था कि लोगों ने मुग़ल शासन की अनिवार्यता को स्वीकार कर लिया था, इसीलिए उन्होंने गाँव-गाँव का दौरा किया था लोगों को आशा और साहस दी ताकि लोग इसके खिलाफ खड़े हो।

 माना जाता है कि उस वक्त कश्मीर में बेहद विद्वान पंडित रहते थे। एक तरह से यह कहा जा सकता था कि कश्मीर पंडितों का गढ़ था। उन दिनों औरंगजेब की तरफ से शेर अफगान खां कश्मीर का सूबेदार हुआ करता था। औरंगजेब के आदेश के अनुसार उसने भी तलवार के दम पर कश्मीरी पंडितों को मुसलमान बनाना शुरू कर दिया था। इससे पहले कश्मीरी पंडितों ने गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर साहिब जी के बारे में सुना था। इसलिए उन्होंने सोचा कि क्यों ना मुगलों के आगे अपना सिर झुकाने से बेहतर वह गुरु तेग बहादुर साहिब जी से जाकर मिलें। ऐसे में कुछ विद्वान पंडितों का समूह गुरु जी से मिलने के लिए आनंदपुर साहिब पहुंचा और इस समस्या पर गुरु जी के साथ संवाद किया। जब कश्मीरी पंडित गुरु जी को अपनी पीड़ा सुना रहे थे, तो गुरु तेग बहादुर साहिब ने कहा कि कमजोरों में जान और दिलेरी डालने के लिए और इस धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए यह जरुरी है की कोई पवित्र व्यक्ति अपनी जीवन की क़ुर्बानी दे। तभी लोगों में हिम्मत आयेगी। इतिहासकारो और पवित्र ग्रंथो के मुताबिक उस वक्त गुरु गोविन्द सिंह जी की उम्र सिर्फ 9 वर्ष की थी, लेकिन उन्होंने अपने पिता को कहा की पिताजी आपसे पवित्र और ज्ञानी व्यक्ति कौन होगा इस कार्य के लिए और शायद तेग़ बहादुर जी भी यही सोच रहे थे। लेकिन बेटे के विचारों ने उनमें आशा की एक और उम्मीद जगा दी। इस बात को सुनकर वहां मौजूद कश्मीरी पंडितों और अन्य लोगों ने कहा कि अगर आपके पिता जी बलिदान दे देंगे तो आप यतीम हो जाएंगे और आपकी मां विधवा हो जाएंगी। 

 जिसके बाद बालक गोबिंद सिंह जी ने कहा कि अगर मेरे अकेले के यतीम होने से लाखों लोग यतीम होने से बच सकते हैं और अकेले मेरी मां के विधवा होने से लाखों मां विधवा होने से बच सकती हैं, तो मुझे यह स्वीकार है। यह सुन कर गुरु तेग बहादुर ने पंडितों से कहा कि जाकर औरंगजेब से कह दो, अगर तुमने हमारे गुरु का धर्म बदल दिया, और अगर उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिए तो हम भी कर लेंगे। जिसके बाद गुरु तेग बहादुर ने इस जवाब को औरंगजेब तक पहुंचा दिया और औरंगजेब ने इस बात को स्वीकार कर लिया।

 

कश्मीरी पंडितों की बात सुनने के बाद गुरु तेग बहादुर जी अपने 4 खास सेवक भाई मती दास, भाई दयाला, भाई सती दास और भाई जैता जी के साथ आनंदपुर साहिब से चल पड़े। गुरु तेग बहादुर साहिब की हिम्मत देखकर औरंगजेब विचलित हो उठा, और उसने गुरु तेग बहादुर और उनके साथियों को तुरंत गिरफ्तार करने का फरमान जारी कर दिया था। औरंगजेब के आदेश पर पांचों सिखों सहित गुरु जी को कैद कर दिल्ली लाया गया। औरंगजेब के हाकमों ने गुरु तेग बहादुर साहिब को मुसलमान बनाने के लिए कई तरह के लालच दिये और भयानक मौत देने की बात कहकर डराने की कोशिश की। लेकिन इसके बावजूद गुरु तेग बहादुर साहिब जी के दिमाग में केवल एक ही बात थी कि अपना शीश कलम करके कश्मीरी पंडितों को बचाया जाये और कमजोर लोगों में हिम्मत भरी जाये।

 गुरु जी को डराने के लिए पहले उनके सामने भाई मतिदास जी को जिंदा आरे से चीर दिया गया, उसके बाद भाई दयाला को उबलते पानी में फेक दिया गया, और आखिर में भाई सती दास जी की ज़िंदा जला दिया गया था। इस जुल्म के बाद भी गुरु जी घबराए नहीं और अंत में गुरु जी को चांदनी चौक में तलवार से शहीद कर दिया गया था। आज इसी जगह पर गुरुद्वारा शीशगंज साहिब मौजूद है। इसके बाद बैसाखी के दिन 21 मार्च 1676 को गुरू गोविंद सिहं अल्पआयु में ही 10वें गुरू घोषित किये गये। इसके बाद गुरू गोबिन्द सिंह ने सिखों की पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथसाहिब को पूरा किया। लेकिन इस दौरान उन्होंने मुगलों और उनके मुस्लिम सहयोगी शासकों के खिलाफ 14 से ज्यादा युद्ध लड़े। धर्म के लिए समस्त परिवार का बलिदान उन्होंने किया, जिसके लिए उन्हें 'सरबंसदानी' (सर्ववंशदानी) भी कहा जाता है।

 गुरु गोबिन्द सिंह की 3 पत्नियाँ थीं। 21 जून, 1677 को 10 साल की उम्र में उनका विवाह माता जीतो के साथ आनंदपुर से 10 किलोमीटर दूर बसंतगढ़ में किया गया। उन दोनों के 3 पुत्र हुए जिनके नाम थे – जुझार सिंह, जोरावर सिंह, फ़तेह सिंह। 4 अप्रैल, 1684 को 17 वर्ष की आयु में उनका दूसरा विवाह माता सुंदरी के साथ आनंदपुर में हुआ। उनका एक बेटा हुआ जिसका नाम था अजित सिंह। 15 अप्रैल, 1700 को 33 वर्ष की आयु में उन्होंने माता साहिब देवन से विवाह किया। वैसे तो उनका कोई संतान नहीं था पर सिख धर्म के पन्नों पर उनका दौर भी बहुत प्रभावशाली रहा।

आनन्दपुर साहिब को छोड़कर जाना और वापस आना

 अप्रैल 1685 में, सिरमौर के राजा मत प्रकाश के निमंत्रण पर गुरू गोबिंद सिंह ने अपने निवास को सिरमौर राज्य के पांवटा शहर में स्थानांतरित कर दिया। सिरमौर राज्य के गजट के अनुसार, राजा भीम चंद के साथ मतभेद के कारण गुरु जी को आनंदपुर साहिब छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था और वे वहाँ से टोका शहर चले गये। मत प्रकाश ने गुरु जी को टोका से सिरमौर की राजधानी नाहन के लिए आमंत्रित किया। नाहन से वह पांवटा के लिए रवाना हुऐ| मत प्रकाश ने गढ़वाल के राजा फतेह शाह के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत करने के उद्देश्य से गुरु जी को अपने राज्य में आमंत्रित किया था। राजा मत प्रकाश के अनुरोध पर गुरु जी ने पांवटा में बहुत कम समय में उनके अनुयायियों की मदद से एक किले का निर्माण करवाया। गुरु जी पांवटा में लगभग तीन साल के लिए रहे और कई ग्रंथों की रचना की।

सन 1687 में नादौन की लड़ाई में, गुरु गोबिंद सिंह, भीम चंद, और अन्य मित्र देशों की पहाड़ी राजाओं की सेनाओं ने अलिफ़ खान और उनके सहयोगियों की सेनाओ को हरा दिया था। विचित्र नाटक (गुरु गोबिंद सिंह द्वारा रचित आत्मकथा) और भट्ट वाहिस के अनुसार, नादौन पर बने व्यास नदी के तट पर गुरु गोबिंद सिंह आठ दिनों तक रहे और विभिन्न महत्वपूर्ण सैन्य प्रमुखों का दौरा किया। भंगानी के युद्ध के कुछ दिन बाद, रानी चंपा (बिलासपुर की विधवा रानी) ने गुरु जी से आनंदपुर साहिब (या चक नानकी जो उस समय कहा जाता था) वापस लौटने का अनुरोध किया जिसे गुरु जी ने स्वीकार किया। वह नवंबर 1688 में वापस आनंदपुर साहिब पहुंच गये।

 1695 में, दिलावर खान (लाहौर का मुगल मुख्य) ने अपने बेटे हुसैन खान को आनंदपुर साहिब पर हमला करने के लिए भेजा। मुगल सेना हार गई और हुसैन खान मारा गया। हुसैन की मृत्यु के बाद, दिलावर खान ने अपने आदमियों जुझार हाडा और चंदेल राय को शिवालिक भेज दिया। हालांकि, वे जसवाल के गज सिंह से हार गए थे। पहाड़ी क्षेत्र में इस तरह के घटनाक्रम मुगल सम्राट औरंगज़ेब लिए चिंता का कारण बन गए और उसने क्षेत्र में मुगल अधिकार बहाल करने के लिए सेना को अपने बेटे के साथ भेजा।खालसा पंथ की स्थापना-

गुरु गोबिंद सिंह जी का नेतृत्व सिख समुदाय के इतिहास में बहुत कुछ नया ले कर आया। उन्होंने सन 1699 में बैसाखी के दिन खालसा जो की सिख धर्म के विधिवत् दीक्षा प्राप्त अनुयायियों का एक सामूहिक रूप है उसका निर्माण किया।

 सिख समुदाय के एक सभा में उन्होंने सबके सामने पुछा – "कौन अपने सर का बलिदान देना चाहता है"? उसी समय एक स्वयंसेवक इस बात के लिए राज़ी हो गया और गुरु गोबिंद सिंह उसे तम्बू में ले गए और कुछ देर बाद वापस लौटे एक खून लगे हुए तलवार के साथ। गुरु ने दोबारा उस भीड़ के लोगों से वही सवाल दोबारा पुछा और उसी प्रकार एक और व्यक्ति राज़ी हुआ और उनके साथ गया पर वे तम्बू से जब बहार निकले तो खून से सना तलवार उनके हाथ में था। उसी प्रकार पांचवा स्वयंसेवक जब उनके साथ तम्बू के भीतर गया, कुछ देर बाद गुरु गोबिंद सिंह सभी जीवित सेवकों के साथ वापस लौटे और उन्होंने उन्हें पंज प्यारे या पहले खालसा का नाम दिया।

 उसके बाद गुरु गोबिंद जी ने एक लोहे का कटोरा लिया और उसमें पानी और चीनी मिला कर दुधारी तलवार से घोल कर अमृत का नाम दिया। पहले 5 खालसा के बनाने के बाद उन्हें छठवां खालसा का नाम दिया गया जिसके बाद उनका नाम गुरु गोबिंद राय से गुरु गोबिंद सिंह रख दिया गया। उन्होंने पांच ककारों का महत्व खालसा के लिए समझाया और कहा – केश, कंघा, कड़ा, किरपान, कच्चेरा।

 इधर 27 दिसम्बर सन्‌ 1704 को दोनों छोटे साहिबजादे और जोरावर सिंह व फतेह सिंहजी को दीवारों में चुनवा दिया गया। जब यह हाल गुरुजी को पता चला तो उन्होंने औरंगजेब को एक जफरनामा (विजय की चिट्ठी) लिखा, जिसमें उन्होंने औरगंजेब को चेतावनी दी कि तेरा साम्राज्य नष्ट करने के लिए खालसा पंथ तैयार हो गया है।

 8 मई सन्‌ 1705 में 'मुक्तसर' नामक स्थान पर मुगलों से भयानक युद्ध हुआ, जिसमें गुरुजी की जीत हुई। अक्टूबर सन्‌ 1706 में गुरुजी दक्षिण में गए जहाँ पर आपको औरंगजेब की मृत्यु का पता लगा। औरंगजेब ने मरते समय एक शिकायत पत्र लिखा था। हैरानी की बात है कि जो सब कुछ लुटा चुका था, (गुरुजी) वो फतहनामा लिख रहे थे व जिसके पास सब कुछ था वह शिकस्त नामा लिख रहा है। इसका कारण था सच्चाई। गुरुजी ने युद्ध सदैव अत्याचार के विरुद्ध किए थे न कि अपने निजी लाभ के लिए।

 औरंगजेब की मृत्यु के बाद आपने बहादुरशाह को बादशाह बनाने में मदद की। गुरुजी व बहादुरशाह के संबंध अत्यंत मधुर थे। इन संबंधों को देखकर सरहद का नवाब वजीत खाँ घबरा गया। अतः उसने दो पठान गुरुजी के पीछे लगा दिए। इन पठानों ने गुरुजी पर धोखे से घातक वार किया, जिससे 7 अक्टूबर 1708 में गुरुजी (गुरु गोबिन्द सिंह जी) नांदेड साहिब में दिव्य ज्योति में लीन हो गए। अंत समय आपने सिक्खों को गुरु ग्रंथ साहिब को अपना गुरु मानने को कहा व खुद भी माथा टेका। गुरुजी के बाद माधोदास ने, जिसे गुरुजी ने सिक्ख बनाया बंदासिंह बहादुर नाम दिया था, सरहद पर आक्रमण किया और अत्याचारियों की ईंट से ईंट बजा दी। गुरू गोबिंद सिंह जी की मृत्यु 7 अक्टूबर, 1708 को हुई थी।

आज यानी बुधवार को सिख धर्म के दसवें गुरु गोविंद सिंह जी की जयंती है। देश-विदेश में सिख समुदाय के लोग इस जयंती को प्रकाश पर्व के रूप में बड़े ही उमंग और उत्साह के साथ मनाते हैं। गुरुपर्व के दिन गुरुद्वारों में कीर्तन और गुरुवाणी का पाठ होता है। सिख समुदाय के लोग सुबह प्रभातफेरी निकालते हैं और लंगर का आयोजन किया जाता है। गुरुद्वारों के आस-पास खालसा पंथ की झांकियां निकाली जाती हैं।

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