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डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा : ‘डॉक्टर और मरीज एक हों’

Bhola Tiwari Jun 14, 2019, 1:50 PM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा 

(जाने माने चिकित्सक नार्वे)

न्यूयॉर्क के ब्रॉन्स अस्पताल की बात कर रहा था, जहाँ के अध्यक्ष भारतीय ही थे, और कई डॉक्टर भी। हार्लेम के हिंसक उसी अस्पताल के इमरजेंसी में आते। एक डॉक्टर को गोली भी मारी गयी थी। दो-तीन दशक पहले तक भारत में चिकित्सक पूज्य थे, और पश्चिम में मार खाते थे। चीन में तो एक डॉक्टर की इलाज से संतुष्ट न हुआ तो ‘यी नाओ’ कर दिया। यानी हत्या कर दी। चीन में बाकायदा डॉक्टर हिंसा के लिए शब्द है। लेकिन अब यह चीन और पश्चिम में घटता जा रहा है, भारत में बढ़ता जा रहा है। ऐसा क्यों है? भारत में आखिर क्या बदलाव हुए? और हल क्या है?

पहली बात है हिंसा की स्वीकारोक्ति। अब कोई किसी को भी पीट सकता है, और एक पक्ष समर्थन करता है या कम से कम विरोध नहीं करता। दरअसल वह हिंसा स्वयं भी करना चाहता था, लेकिन हिम्मत नहीं थी या मूड नहीं था, किसी और ने कर दिया। 

दूसरी बात है स्वास्थ्य व्यवस्था का बढ़ता निजीकरण, और निजी हस्पतालों को घटता सरकारी सहयोग। कुल मिला कर स्वास्थ्य का मँहगा होना। मरीज जब निजी अस्पतालों से धक्के खाकर सरकारी अस्पताल आता है, तो एक कमजोर नौसिखिए डॉक्टर को ढूँढता है और पीट देता है। मरीज नहीं, मरीज के परिजन भी कई बार नहीं, कोई थर्ड-पार्टी। यही लोग सड़क पर किसी दुर्घटना में भी पीटने को तैयार होते हैं, भले उनकी गाड़ी हो या न हो। वह तो अपनी भड़ाँस का माध्यम ढूँढ रहे हैं।

तीसरी बात है मॉब हिंसा में कानून का लचर होना। व्यक्तिगत हिंसा में आरोप सुलभ है। आप पहचान करिए, वह सजा पाएगा। मॉब हिंसा अधिक घातक है। पहचान और आरोप सिद्ध करना, दोनों असंभव है। मैं भी एक हिंसा का गवाह रहा हूँ, पहचान ही नहीं पाया। इसलिए यह सबसे सुलभ हिंसा भी है। लोग सोचते हैं कि वह सामाजिक हिंसा का हिस्सा बन कर समाज-कार्य में सहयोग दे रहे हैं। एक थप्पड़ उनका भी। 

आखिरी बात है अपरिपक्वता और चिकित्सक-मरीज के मध्य बढ़ती दूरी। दो-तीन दशक पहले फैमिली डॉक्टर का वाक्य पत्थर की लकीर होती थी। उन्होंने कह दिया कि अब दुआ ही सहारा, तो खाट बाहर करना और अन्य कार्य में लोग लग गए। अब यह कम्युनिकेशन-गैप बढ़ता जा रहा है और दोतरफा विश्वास की कमी है। मृत्यु-संदेश देना या काउंसेलिंग करना कठिन होता जा रहा है। 

ये तो हुई समस्याएँ। हल भी इन्हीं समस्याओं में छुपा है। डॉक्टर ‘आइ सपोर्ट डॉक्टर्स’ का झंडा लेकर चलेंगे तो बात न बनेगी। डॉक्टर लिखें ‘आई सपोर्ट पेशेंट्स’ और मरीज लिखें ‘आई सपोर्ट डॉक्टर्स’। यही तो हमारा संबंध है। 

अब बात करते हैं समस्या के सलूशन की। हिंसा (भौतिक या मानसिक) का हल असंतोष का निदान तो है ही, सामाजिक चेतना को जागृत करना भी है। और इसका भी पिरामिड है। शिक्षित और संज्ञानी हिंसा में इसलिए भी कम लिप्त होते हैं कि उन्हें मालूम है कि चिकित्सा-शास्त्र की लिमिट क्या है। यह वैश्विक पैटर्न है। यूरोप में भी आक्रोशित मरीज होते हैं, और उन्हें समझाना पड़ता है कि अमुक कारणों से मृत्यु हुई। इसमें ‘हुआ तो हुआ’ की नीति नहीं चलती। ख़ास कर मीडिया और संचार साधनों की इसमें अहम भूमिका है कि वह स्वास्थ्य संबंधी मामलों में सनसनी के बजाय संज्ञान लें और विशेषज्ञ से सहयोग लें। बेंगलुरू में एक डॉक्टर मित्र के विषय में खबर छप गयी कि टखने में सूजन की जाँच के लिए महिला की पतलून उतरवा ली। जबकि वह अल्ट्रासाउंड से खून का थक्का जाँच रहे थे, जो ऊपर जाँघ में ही अक्सर जमता है। ऐसे ही एक अखबार में शीर्षक पढ़ा कि महिलाओं में प्रोस्टेट ग्रंथि के कैंसर कम मिल रहे हैं। महिलाओं में यह ग्रंथि होती ही नहीं तो मिलेगी कैसे? 

दूसरी बात कि सरकारी अस्पतालों की संरचना और वेटिंग टाइम पर कार्य हो। संसाधन नहीं हैं, ऐसी बात नहीं है। कम जरूर हैं। उसकी वजह जी.डी.पी. का एक प्रतिशत से भी कम मूल निवेश है। उस हिसाब से संसाधन बुरे नहीं, और आज भी सरकारी अस्पतालों में यथासंभव मुफ्त सेवाएँ या कम दाम में सेवाएँ उपलब्ध हैं। निजी संस्थानों से पार्टनरशिप भी बढ़ रही है, हालांकि वह दोधारी तलवार है। किसी भी स्थिति में यह फैसला जनता के प्रतिनिधियों को ही लेना है कि वह चुनावी मुद्दों में स्वास्थ्य को किस पायदान पर रखते हैं। रखते भी हैं या नहीं?

तीसरी बात है मूलभूत सुरक्षा सुविधाएँ। अस्पताल या कोई भी जन-कार्यालय सुरक्षित रहे। पुलिस-तंत्र काबिल तो है ही, लेकिन वह न सरकारी अस्पतालों को समुचित सुरक्षा दे पा रहा है, न निजी अस्पतालों को। निजी अस्पताल अब बाउंसर रखने लगे हैं, जो चिंताजनक है। अस्पताल कोई दंगल का मैदान तो है नहीं। 

आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण बात है पारदर्शिता। डॉक्टर और मरीज के मध्य कोई गैप न हो। फलाँ जाँच क्यों हो रही है, कितना खर्च आएगा। उसके क्या निष्कर्ष होंगे। यह जरूर एक नॉन-मेडिकल व्यक्ति को समझाना कठिन है, समय भी लगता है। लेकिन, इससे दोनों में विश्वास मजबूत होता है। जो चिकित्सक ऐसा नियमित करते हैं, उन्हें आदत पड़ जाती है और उनके अनुभव भी बेहतर होते हैं।

बात चिकित्सा की है, लेकिन यह अन्य सेक्टर में भी समान रूप से ‘कन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट’ के लिए कमोबेश ठीक बैठता है। बाकी, जब माहौल गरम हो तो ये सुझाव कड़वे और ख़्वाह-म-ख़्वाह लग सकते हैं। फिर से कहूँगा कि ‘भारत के डॉक्टर एक हों’ के नारे से अधिक जरूरी है ‘डॉक्टर और मरीज एक हों’। हम एक ही थे, और एक ही रहेंगे।

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