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गठबंधन के भंवर जाल में फंसे हेमंत

Bhola Tiwari Jun 11, 2019, 11:28 AM IST टॉप न्यूज़
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  रिपोर्ट : अजय कुमार


रांची :  लोकसभा चुनाव के पहले विभिन्न पार्टी के मुखिया ने रांची से लगाए दिल्ली तक दौड़ लगाई। एक मजबूत गठबंधन बनाने के लिए, जो बीजेपी को परास्त कर सके। मगर सपना, सपना ही रह गया। टूट गया। चकनाचूर हो गया। सारी रणनीति फेल हो गई। सारे जातीय समीकरण धरे के धरे रह गए। बीजेपी को छोड़ बाकी सभी फेल। अब आई समीक्षा की बारी तो अपनी डफली अपना राग।

 तो आइए हम बात करते हैं रियासत में गठबंधन की सियासत की। लोकसभा चुनाव के पहले गठबंधन को लेकर जो रस्साकशी और मंथन हुआ, आम लोगों ने देखा तो लगा कि वाकई में गठबंधन महागठबंधन का रूप लेगा। गठबंधन भी हुआ। मजबूत गठबंधन, जो प्रदेश में हुंकार भरा। हरा करके बीजेपी को दिल्ली भेज देंगे। प्रदेश में घुसने नहीं देंगे। यहां तक तो सब कुछ ठीक था। लेकिन लोकसभा के परिणाम आते ही चारों तरफ़ मायूसी छा गई। मायूसी इतनी की समीक्षा बैठक में अलग ताल और नगाड़े बजने लगे।

 जिस राष्ट्रीय दल ने हिंदुस्तान की सियासत में वर्षों से राज किया उस कांग्रेस पार्टी में आज आपसी दंगल चरम पर है। झारखंड, पंजाब, मध्यप्रदेश, राजस्तान से लगाए दिल्ली तक सभी आपस में ही ताल ठोक रहे हैं। अहम की लड़ाई। कुर्सी की लड़ाई। गुटों की लड़ाई चरम पर है। 

 हाल ही में झारखंड के रांची में हुए समीक्षा बैठक में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने ऐसा ही नजराना पेश किया, जो कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं है। बावजूद प्रदेश के प्रभारी आरपीएन सिंह यह कह गए कि अब गठबंधन होगा अथवा नहीं यह विचार का विषय है। लिहाज़ा सभी सहयोगियों के लिए सिर दर्द वाली बात है। क्योंकि गठबंधन का आधार ही इस बात पर था की लोक सभा इलेक्शन कांग्रेस के नेतृत्व में और विधानसभा का इलेक्शन जेएमएम के नेतृत्व में लड़ने की बात तय हो गई थी। लेकिन जो सुर और ताल लोकसभा के परिणाम आने के बाद सुनाई दे रहे हैं वो सभी सहयोगी दलों की पाचन क्रिया खराब करने वाली है। खास करके जेएमएम असमंजस में है। परेशानी में है। इसकी भी वजह है। जेएमएम का जो परंपरागत किला था, उसमें सेंध लग चुका है। लोक सभा इलेक्शन में गठबंधन को मुंह की खानी पड़ी। जेएमएम और कांग्रेस को बोहनी तो हो गया मगर अन्य सहयोगी को ढेला भी नसीब नहीं हुआ।

कांग्रेस के जानकारों का मानना है कि पार्टी इस बात पर को लेकर गंभीर है कि अब इस तरह का कोई भी स्टेप नहीं लिया जाएगा जिससे पार्टी के टूटने का डर और कार्यकर्ताओं के नाराज होने का कोई मामला सामने आए। विधानसभा चुनाव के संदर्भ में पार्टी इस बात को भलीभांति जानती है की रियासत में जेएमएम का पलड़ा भारी है और निश्चित रूप से उसे ज्यादा सीटें देनी पड़ेगी। ऐसा अब पार्टी करना नहीं चाहती है। लोकसभा में सीटों को लेकर हुई तालमेल से पार्टी के लोगोँ की काफी नाराजगी झेलनी पड़ी थी। पार्टी के शीर्ष नेता इस बात को बड़े ही शिद्दत से समझते हैं। इसी वजह से वह कोई ऐसा काम अब नहीं करना चाहते जिससे पार्टी फिर टूट के कगार पर पहुंच जाए।

 अब बात जेएमएम की जो कई बार रियासत की बागडोर संभाल चुकी है। असमंजस में है। भंवर में है। छला हुआ महसूस कर रही है। और लोकसभा के परिणाम आने के बाद सहमी हुई नजर आ रही है। गठबंधन बनने के दौरान पार्टी में भी विरोध की सुगबुगाहट थी। कई वरिष्ठ नेताओं ने दबी जुबान से गठबंधन में शामिल नहीं होने की बात भी कही। मगर हेमंत सोरेन की चौकड़ी ने सूबे में सबसे मजबूत दिखने वाली पार्टी जेएमएम को गठबंधन करने पर मजबूर कर दिया। और उसका खामियाजा सामने है। पार्टी भी टूट गई। कई लोग राह बदल लिए। गुरु जी अपने चेले से ही हार गए। और अब माथे पर पसीना इस बात को लेकर है कि आगे आने वाले चुनाव में किस रणनीति को लेकर आगे बढ़ा जाए। कौन सी ऐसी चाल को साध लिया जाए, ताकि अपने परंपरागत दुर्ग को बचाया जा सके।

 जहां तक बाबूलाल मरांडी का सवाल है, वह खुद हार गए। पार्टी का खाता भी नहीं खुला। सबसे बुरा हाल तो राजद का हुआ। पार्टी के सभी कद्दावर नेता भगवा ध्वज में लिपट गए। और पार्टी प्रदेश में यतीम हो गई।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य में कांग्रेस और जेएमएम का गठबंधन यूपी में सपा और बसपा के गठबंधन की तरह है। यूपी में बसपा को भरपूर लाभ मिला जबकि सपा को काफी नुकसान हुआ। 

ऐसा ही कुछ झारखंड में हुआ। झारखंड में कांग्रेस को गठबंधन का लाभ मिला तो जेएमएम को नुकसान उठाना पड़ा। यूपी में बसपा, सपा को छोड़ चुकी है। और लगता है झारखंड में कांग्रेस जेएमएम को छोड़ने वाली है?

गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने कांग्रेस से गठबंधन कर लोकसभा चुनाव लड़े थे, लेकिन जब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस संग गठबंधन कर चुनाव लड़ने की बारी आई तो कांग्रेस ने हाथ खड़े कर दिए थे। 

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