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क्या किसान को समझने में असफल है वर्तमान सरकार

Bhola Tiwari Dec 01, 2020, 9:00 AM IST टॉप न्यूज़
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निशिकांत ठाकुर 

 नई दिल्ली : भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री ने नारा दिया था - जय जवान जय किसान। अर्थ स्पष्ट है कि उन्होंने देश की रक्षा में अपने प्राणों की आहूति देने वालों का नमन किया उनके लिए जय जयकार किया और किसानों में उत्साह भरने के लिए उनके भी जय जयकार का नारा दिया। यदि जवान देश की रक्षा में है, तो किसान आपको जीवन देने के लिए जीतोड़ मेहनत करके अनाज उगाकर हमारा पेट भरते हैं। खेती करने और अनाज उगाने में हमारे देश के लगभग 80 प्रतिशत किसान लगे हैं, जिससे हम 100 प्रतिशत भारतीय जीवित है। उनकी मेहनत, उनकी कर्मठता को शत शत नमन। 

अपना इतिहास यदि हम देखें तो पिछले पचास वर्षों में भारत में जो हरित क्रांति शुरू हुई आज उसी का परिणाम हुआ है कि देश ही नहीं, विश्व पर करोना 19 के संकट होने के बाद भी हम किसी भी देश के आगे हाथ फैलाने नहीं गए और अन्न के भंडार आज भी देश में भरे पड़े हैं। किसी लापरवाही से यदि देश में भूख से मौत हो जाए तो वह अफवाद ही होगा क्योंकि हमारे किसानों ने सरकार के सहयोग और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर खेती के नए नए तरीके अपनाए और उन्होंने हमें आत्मनिर्भर बना दिया। अब हमारे देश में विदेशों से लदकर समुद्री मार्ग से जहाज नहीं आते। हां, कुछ खाद्य सामग्री अपवाद जरूर है ।


किसानों की इस मेहनत की कोई प्रशंसा नहीं करता, उनकी पीठ पर कोई हाथ नहीं रखता। यदि वह अपने परिश्रम की कीमत मांगता है, तो सर्दी में भी उसके उपर पानी की बौछार मारकर उसे अपने हक को मांगने से रोक दिया जाता है। यह बात इसलिए कह रहा हूं क्योंकि इस बीच किसानों के साथ जो कुछ हुआ और हो रहा है उसे देखकर ऐसा लगता है कि सरकार से देश के अन्नदाता द्वारा अपना अधिकार मांगना अपराध हो गया है। बड़े बड़े राजनेता लगभग किसान परिवार से ही आते हैं , लेकिन सत्ता की कुर्सी पर पहुंचते ही उन्हें सत्ता सुख इतना प्रिय और लाभप्रद लगने लगता है कि वह अपने ही परिवार के ही किसान सदस्यों की पिटाई करके पानी की बौछारों को मारकर सरकार के पक्ष में गलत बयानी करते हैं, समाज को बरगलाते हैं। ऐसा इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि कृषि से संबंधित विवादित विधेयक आज देश भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। पंजाब से शुरू हुआ यह आंदोलन अब धीरे धीरे पूरे भारतवर्ष में जोर पकड़ कर आग की तरह सुलग रहा है। 

मुद्दा वहीं विवादित कृषि विधेयक है, जिसके विरोध में सत्तारूढ़ दल में शामिल अकाली दल की हरसिमरत कौर ने मंत्री मंडल से त्यागपत्र दे दिया। प्रधानमंत्री कहते हैं कि यह किसानों के हित में है और उन्हें दलालों के चंगुल से मुक्त कराने का एक प्रयास है । यह ठीक भी है कि जिस सरकार ने उनके ही नेतृत्व में विधेयक को पास किया हो, उसकी आलोचना भला मंत्रिमंडल में कौन कर सकता है। हां, जिसने विरोध किया उसने त्यागपत्र दे दिया। भारत में आंदोलन आज से नहीं, करीब 1900 के आसपास से ही किसान गोलबंद होने लगे थे और 1917 ,1920 में अवध किसान सभा का गठन हुआ। किसानों के गोलबंद होने की खबर पूरे देश में फैल गई और महाराष्ट्र के नेता बाबा रामचंद्र इसमें शामिल हो गए। वह गांव-गांव घूमकर रामकथा सुनते थे और किसानों को एकजुट करने लगे।

इन आंदोलनकारी किसानों के प्रति कितनी गलत धारणा बना दी गई है, अथवा इस तरह कह सकते हैं कि किसानों की छवि आमलोगों के मन में यह भर दी गई है कि कोई भी किसान यदि बड़ी कार पर चढ़ता है , कोई कीमती फोन रखता है, तो निश्चित रूप से वह किसान नहीं है। अर्थ स्पष्ट है कि उस मानसिकता के लोगों के लिए केवल और केवल वही किसान हो सकता हैं, जो खाली बदन धोती पहनकर खेतों में हल जोतता है। मेढ़ पर बैठकर रोटी नमक खाता है और झोपड़ियो में रहकर हर समय एक जून की रोटी के लिए चिंतित रहता है। इस प्रकार की घटिया सोच से ऐसे लोग कब मुक्त होंगे ? 

दरअसल, हमारे देश के कुछ तथाकथित वह वर्ग अथवा जो यह नहीं चाहते कि उनकी बराबरी कोई कर सके खासकर किसान कैसे उनकी बराबरी में खड़ा हो जाएगा ? क्यों वह मंहगे फोन, बड़ी गाड़ी अच्छे घर में रहेगा। ऐसे लोगों को जन्मजात इस तरह की घुट्टी पिलाई जाती है कि किसान गरीब, और याचक ही होता। न्यूनतम समर्थन मूल्य कानून बनाते समय जिन किसान नेताओं या तथाकथित जिन सलाहकारों से राय मशविरा सरकार ने किया होगा, उन्होंने केवल ऐसे अधिकारियों , मंत्रियों की हां में हां मिला दिया होगा, जो कभी भी यह नहीं देखा होगा कि सच मे आम किसानों की दशा क्या है ?बड़ी गाड़ी अच्छे फोन तथा अच्छे घरों में रहनेवाले तो कुछ ही प्रतिशत किसान देश में है। जहां तक पंजाब के किसानों को बात है वह तो यूरो, पाउंड और डॉलर इतना कमा लेते है कि स्वयं अपना हित और अपनी जिंदगी को मस्ती में जीते हैं ही, देश के खजाने में भी विदेशी मुद्रा भरने में भरपूर योगदान देते हैं। 

केंद्रीय सरकार को इस तरह के विशेषज्ञों से जरूर सलाह लेने की जरूरत थी । यदि विशेषज्ञों की सलाह पर कानून बनाया गया है, तो फिर सरकार और विशेष रूप से कृषि मंत्री को किसानों से मिलकर उनसे बात करके यह बताना ही चाहिए कि इस कानून से उसका कोई नुकसान नहीं है, बल्कि यह और इस प्रकार का लाभ है । लेकिन, दुर्भाग्य यह की कृषि मंत्री इतने व्यस्त हैं कि उन्होंने किसानों के इतने बड़े आंदोलन को भी अनदेखा किया और मिलने का इतना लंबा समय दिया कि किसानों का गुस्सा फुट निकला और सरकार ने उन किसानों पर ठंडे पानी और अश्रु गैस के गोले छोड़कर अमानवीय कार्य किया। अब भी समय नहीं बीता सरकार को किसानों की समस्या के समाधान के लिए अगुआई करने वाले नेताओं से बातचीत करके इस मामले पर गहन समीक्षा करके इसका त्वरित समाधान करना चाहिए। यदि शीघ्र ही समाधान सरकार ने नहीं निकला, तो जिस तरह से किसानों ने दिल्ली को घेरना शुरू कर दिया है, उसका निराकरण दुखदाई हो सकता है। अतः इस आग में घी न डालकर इसपर पानी ही डालकर शीघ्र उसे बुझाने की जरूरत है ।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक है)।

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