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••••• कहीं न कहीं गुलामी का दर्द है

Bhola Tiwari Jun 09, 2019, 6:17 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा 

(जाने माने चिकित्सक नार्वे)

जे सुशील ने ब्लूज़ की बात छेड़ी तो याद आया 2003 में एक पाँच सौ डॉलर की खटारा गाड़ी खरीदी, जिसे लेकर इलिनॉइस में दुबका रहता था। गोरों का शहर था, भारतीय यूँ भी दुबके घेट्टो बनाए रहते थे। हालांकि अपनी सीमा में आते ही शेर बन जाते। खैर, पता लगा दो जानकार एफओबी (फ्रेश ऑन बर्ड) मेम्फिस शहर आए हैं। मुझे फोन किया कि अमरीक्का का कुछ समझ नहीं आ रहा। मेरे भी कुछ ही महीने हुए थे, गाड़ी भी खटारा थी। दोस्त ने पूछा कि कितनी खटारा है? चलाते हुए बोनट हिलता है? मैंने कहा-हाँ यार! बड़ी बुरी स्थिति है। उसने कहा कि बिल्कुल आदर्श है। 

मेम्फ़ीस में गर गाड़ी खटारा न हो, और बोनट न हिले तो आदमी बाहर का लगता है। यह गोरों की बस्ती का ठीक उल्टा मामला था। वहाँ तो गाड़ी थोड़ी खराब हुई, पाँच सौ डॉलर में डंप कर दी। मेम्फ़ीस में? खटारा रॉक्स! 

वहाँ पहुँच कर अचानक कॉलर ऊँची हो गयी। अश्वेत शहर में जैसे होमली फ़ील हो रहा था। कमरे पर पहुँचते ही मित्र ने कहा कि कल नीचे गैस स्टेशन (पेट्रोल पंप) पर गोली चली। मैंने कहा कि भाई! मस्त माहौल है। गाड़ी निकाल घूमने निकले तो एक त्रिकोणाकार इमारत दिखाई जिसके अंदर माइक टायसन घूँसे मारते थे। कुछ ही देर में हम ‘बील स्ट्रीट’ पहुँच गए जहाँ रास्ता बंद था और सब सड़क पर नाच-गा रहे थे। और वहीं एक कोना था, जहाँ एक अश्वेत व्यक्ति पसीने से तर-बतर यूँ गा रहा था जैसे सब कुछ लुट गया हो। गाते-गाते ही वह हमारे पास झुक कर गुस्से में घूरता और रुआँसा मुँह कर लेता। समझ नहीं आया कि यह क्या गीत है, करुणा और आक्रोश का भला यह क्या कॉम्बो है? चाहे गायक सौ पर्फॉर्मेंस दे चुका हो, उसका गला रुँधेगा ही, आँसू बहेंगे ही और आवाज फिर भी बुलंद जब गाएगा-‘थ्रिल इज गॉन’

ब्लूज़ संगीत में कहीं न कहीं गुलामी का दर्द ही है, जो प्रेम-विरह का आवरण ओढ़े है। नॉर्वे में हर शहर में इसका केंद्र है, लेकिन गवैये बाहर से ही बुलाए जाते हैं। अपवाद हुए, लेकिन सच यह है कि ब्लूज़ गोरे गा ही नहीं सकते।


(भारतीय लोकगीतों में भी मिलते-जुलते गीत और वाद्य हैं जिसे एक ख़ास समुदाय ही उस रस से गा-बजा सकते थे और कारक भी मिलते-जुलते ही हैं।)

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