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क्या "सरदार पटेल" के साथ "गाँधीजी" ने अन्याय किया था ?

Bhola Tiwari Jun 09, 2019, 6:05 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश हुकूमत बेहद कमजोर हो चुकी थी और भारत में आजादी का आंदोलन अपने शबाब पर था।ब्रिटिश शासन की तरफ से संकेत मिलने शुरू हो गए थे कि चरणबद्ध तरीके से अंग्रेजी हुकूमत सत्ता का स्थानांतरण कर देगी।

1946 में ब्रिटिश सरकार ने कैबिनेट मिशन प्लान बनाया, इस प्लान को आसान शब्दों में समझें तो कुछ अंग्रेज अधिकारियों को ये जिम्मेदारी मिली कि वे भारत की आजादी के लिए भारतीय नेताओं से बात करें।फैसला ये हुआ कि भारत में एक अंतरिम सरकार बनेगी।अंतरिम सरकार के तौर पर वायसरॉय की एक्जीक्यूटिव काउंसिल बननी थी,जिसमें वायसरॉय को अध्यक्ष होना था जबकि कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष को इस काउंसिल का वायस प्रेसिडेंट बनना था जो आगे चलकर आजादी के बाद स्वतंत्र भारत का पहला प्रधानमंत्री बनेगा।

सब कुछ तय होने के बाद महात्मा गांधी ने तब के कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद को कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने को कहा,आजाद इस्तीफा नहीं देना चाहते थे मगर गाँधीजी के स्पष्ट आदेश के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

आजाद के इस्तीफे के बाद नये अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए अप्रैल 1946 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई गई।इस महत्वपूर्ण बैठक में नए अध्यक्ष की नियुक्ति से ज्यादा आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री का नाम राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में घोषित होना था।

बैठक की शुरुआत करते हुए पार्टी महासचिव आचार्य जेबी कृपलानी ने कहा कि परंपरा ये रही है कि कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अनुमोदन से किया जाता है।जिसके पास जितने ज्यादा मत होते हैं वही अध्यक्ष मनोनीत किया जाता है।जवाहरलाल नेहरू को किसी भी प्रान्तीय कमेटी ने अनुमोदित नहीं किया है जबकि सरदार पटेल को पंद्रह में से बारह प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों का समर्थन हासिल है।

गाँधीजी जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष बनाना चाहते थे ये जगजाहिर हो गया था और उन्होंने अपनी मंशा को छुपाया भी नहीं था।गाँधीजी का सोचना था कि जवाहरलाल अंग्रेजों से सरदार पटेल की तुलना में बेहतर डील कर सकते हैं।

आचार्य कृपलानी को बैठक में गाँधीजी ने एक पर्ची लिखकर भिजवाया उसका मजमून था कि आप जवाहरलाल का नाम प्रस्तावित करें।कृपलानी के पास कोई चारा नहीं था और उन्होंने कहा कि बापू की भावनाओं का सम्मान करते हुए मैं जवाहरलाल का नाम अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित करता हूँ।ये कहते हुए उन्होंने सादे कागज पर जवाहरलाल का नाम खुद प्रस्तावित कर अनुमोदन के लिए अन्य वर्किंग कमेटी के सदस्यों के पास भेजा।हस्ताक्षर होते हुए ये कागज जब सरदार पटेल के पास पहुँचा,उन्होंने ध्यान से पढ़ा और हस्ताक्षर कर दिये।

महासचिव ने एक और कागज लिया और उसपर सरदार पटेल को उम्मीदवारी वापस लेने का जिक्र किया और सरदार पटेल के पास हस्ताक्षर के लिए बढा दिया।सरदार पटेल ने उस कागज पर बिना हस्ताक्षर किए गाँधीजी को बढ़ा दिया।मामला पेचीदा हो गया था।गाँधीजी ने जवाहरलाल को संबोधित करते हुए कहा कि तुम्हारे लिए किसी भी प्रांत से अनुमोदन नहीं आया है तुम्हें इस विषय में क्या कहना है।जवाहरलाल ये सुनकर बैचेन हो गए, उनके पास कोई उत्तर नहीं था।उनकी खामोश उनके हालात बयां कर रहे थे।

नेहरू की चुप्पी साध लेने के बाद महात्मा गांधी ने वो कागज फिर सरदार पटेल की तरफ बढ़ा दिया और सरदार पटेल ने तुरंत उसपर हस्ताक्षर भी कर दिये।उसी समय ये तय हो गया था कि स्वत्रंत भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू होंगे।

विपक्षी नेता इसी बात को लेकर कहते हैं कि सरदार पटेल के साथ अन्याय हुआ जो सही भी है मगर उनका विरोध अन्याय करने वाले के ऊपर न होकर अन्याय का फल चखने वाले के ऊपर है।गाँधीजी को वो अन्यायी बोल नहीं सकते तो जवाहरलाल हीं सही।जवाहरलाल नेहरू के नाम पर कांग्रेस का विरोध कर सरदार पटेल के अनुयायियों को अपनी तरफ खींचने का राजनीतिक प्रयास किया जा रहा है जो निंदनीय है।अगर नरेंद्र मोदी वाकई सरदार पटेल के ऊपर अन्याय से दुखी हैं तो उन्हें सार्वजनिक रूप से महात्मा गांधी की आलोचना करनी होगी।मेरा तो स्पष्ट मत है कि इस पक्षपात में गाँधीजी जी पूरी तरह जिम्मेदार हैं,पंद्रह में से बारह प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों का समर्थन हासिल होने के बाद भी गाँधीजी ने सरदार पटेल को क्यों नहीं चुना, क्या उनमें कुछ कमी थी या अपनी पसंद थोपना चाहते थे।

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