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नसरुद्दीन शाह और उनका डर

Bhola Tiwari Jun 05, 2019, 6:27 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

 "मुझे इस बात का डर लगता है कि कहीं मेरे बच्चों को भीड़ ने घेर लिया और उनसे पूछा कि तुम हिंदू हो या मुसलमान? मेरे बच्चों के पास इसका कोई जवाब नहीं होगा क्योंकि मैंने मेरे बच्चों को मजहबी तालीम नहीं दी है। अच्छाई और बुराई का मजहब से कोई लेना-देना नहीं है।"

नसरुद्दीन शाह

अभिनेता

आपकी ये चिंता तो जायज है नसरुद्दीन शाह साहब,मगर अब भारत में रहने पर डर लगता है माफ किजिएगा मैं आपसे सहमत नहीं हूँ।हर देश हर समाज में कुछ अच्छे-बुरे लोग रहते हैं, सभी सभ्य समाज का ताना बाना ऐसा हीं है।विदेशों में भी ऐसी घटनाएं होती रहती है वहाँ तो कोई ये नहीं कहता कि मैं देश छोड़ दूँगा या हमारा समाज हिंसक है।आपने अपने बच्चों को मजहबी तालीम नहीं दी है इसका मतलब ये नहीं है कि आपने सही किया या गलत, ये तो व्यक्ति विशेष का विशेषाधिकार है।

दूसरी शंका आपने उठाई है कि अब पुलिस अधिकारी की मौत गाय की मौत से ज्यादा महत्व रखने लगी है।

हम सभी ने गोरक्षक दलों के माँब लिचिंग पर खूब लिखा है,मैं ये मानता हूँ इस तरह की घटनाएं बढ़ी हैं जो गलत हीं नहीं निंदनीय भी है।मगर तस्वीर के दूसरे पहलू पर भी विचार करना होगा नसरुद्दीन शाह साहब।अधिकांश घटनाओं में गोतस्कर जो मुस्लिम समाज के होते हैं उनके पास से गोमांस बरामद किए गए हैं।आपको बता दूं हिंदुओं के लिए गाय माँ के समान है, समाज में अगर गोकशी होगी तो हिंदू समाज अवश्य आंदोलित होगा,विरोध प्रर्दशन होंगे।भीड़ द्वारा हिंसा गलत है मगर जैसे मुस्लिम समाज में कुछ भटके लोग गोकशी करते हैं, गोमांस खाते हैं वैसे हीं हिंदू समाज में कुछ भटके हुए नौजवान हैं जो कानून अपने हाथों में ले लेते हैं।नसरुद्दीन शाह साहब अगर आप अपनी चिंता के साथ ये भी जोड़ देते कि कोई भी मुसलमान गोकशी न करे और न हीं गोमांस का कारोबार करे तो ये संदेश एक तरफा न होता।जो सच है उसे बोलने में गुरेज क्यों?

ये देश सभी का है और सभी इसके सम्मानित नागरिक हैं फिर सिर्फ एक जानवर जो हिंदुओं के लिए पवित्र है,हिंदू उसे माँ का दर्जा देते हैं क्या भटके हुए नौजवान गोमांस की तस्करी छोड़ नहीं सकते।आप एक अपील करते तो बेहतर होता,आप बहुतों के रोल माँडल हैं आपकी अपील सुनी जाती।

मैं मानता हूँ इन दिनों समाज में जहर फैला है, लोग कानून को अपने हाथ में ले रहें हैं ये वाजिब चिंता है और सभी आपसे सहमत हैं।एक और चिंता की तरफ मैं आपका ध्यान आकृष्ट कराना चाहता हूँ, कश्मीर में नौजवानों द्वारा सेना पर पत्थरबाजी पर भी आपका बयान जरूरी है, शायद आपकी अपील सुन ली जाए।आतंकवादियों की न तो कोई जाति होती है और न हीं मजहब।मगर ये फौज तो हमारी है हमारे मुल्क की है।ये हमारी सुरक्षा के लिए है इन पर पत्थरबाजी कहाँ तक जायज है सोचना होगा।हम कश्मीर में आए जलजले को याद कर लें,किसने कश्मीरियों की जान बचाई थी।अपनी जान जोखिम में डालकर सेना के जवानों ने कश्मीर के लोगों को बाढ से निकाला था,उस समय तो सहायता के लिए पाकिस्तान या हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता आगे नहीं आए थे।जो आपकी सुरक्षा में मुस्तैद है उसी के ऊपर पत्थरबाजी को आप कहाँ तक जायज ठहरा सकते हैं।

नसरुद्दीन शाह साहब दोनों तरफ से गल्तियां हो रहीं हैं जो किसी भी सूरत में रूकनी चाहिए।आपकी चिंता जायज है सभ्य समाज में हिंसा का कोई स्थान नहीं है ये सभी को समझना होगा।

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