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जब प्यार किया तो डरना क्या ?

Bhola Tiwari Jun 04, 2019, 7:22 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

मुगल -ए -आजम फिल्म बनने में दस साल लग गए थे । वजह थी फिल्म के निर्देशक के आसिफ का हर दृश्य में 

उच्चतम मानक स्थापित करने की ललक । एक बार तो तंग आकर निर्माता ने इस फिल्म की कमान सोहराब मोदी को सौंप दी थी। निर्माता ने साफ शब्दों में सोहराब को स्पष्ट आदेश दिया कि किसी भी हालत में फिल्म 30 दिन में पूरी होनी चाहिए । सोहराब मोदी ने फिल्म की पिछली प्रिंट देखी । उन्होंने फोन कर निर्माता को निर्देशक न बदलने सुझाव दिया , क्योंकि फिल्म क्लासिक बनने जा रही थी ।

फिल्म की अवधि 173 मिनट थी । पृथ्वीराज कपूर इस फिल्म के मुगल -ए - आजम (अकबर ) थे । जाहिर तौर पर फिल्म भी उनके इर्द गिर्द हीं घूम रही थी । यह बात उनके बेटे बने दिलीप कुमार (सलीम) को बड़ी नागवार गुजरी । उन्होंने इस सम्बंध में कई बार फिल्म के निर्देशक के आसिफ से शिकायत की । उन्हें शक था कि निर्देशक बिला वजह पृथ्वी राज कपूर को उनसे ज्यादा तरजीह दे रहा है। के आसिफ ने उन्हें समझाया कि वे मुगल -ए - आजम बना रहे हैं , न कि सलीम -ए - आजम। इसलिए वे मुगल ए आजम के किरदार को प्राथमिकता दे रहे हें । जब वे सलीम -ए - आजम बनाएंगे तो इस किरदार को भी इसी तरह की प्राथमिकता देंगे । दिलीप कुमार चुप हो गये । इसके बाद ऊन्होंने कभी शिकायत नहीं की ।

रूपहले पर्दे पर कामयाबी के झण्डे गाड़ती हुई यह फिल्म कब नम्बर 1 बन गयी पता हीं नहीं चला । जब शोले पिक्चर रिलीज हुई तब जाकर इसका नम्बर 1 का ताज छिना । इस फिल्म की लोक प्रियता का यह आलम था कि हाउस फुल का बोर्ड लग जाने के बावजूद लोग लाईन नहीं छोड़ते थे । वे लाईन में हीं सो जाते थे फिर अगली सुबह के लिए । पाकिस्तान , श्री लंका व म्यांमार से लोग आते थे इस फिल्म को देखने के लिए । मुगल -ए - आजम देश की लगभग 150 पिक्चर हाॅलों में एक साथ लगी थी । एक हफ्ते का हीं कलेक्सन 40 लाख था । पहले दिन देखने के बाद समीक्षकों ने इसके फ्लाॅप होने की भविष्यवाणी कर दी थी , परन्तु के आसिफ इसके सुपर डुपर हिट होने के प्रति आशावान थे । दूसरे दिन से मुगल -ए - आजम ने मंथर गति से गति पकड़ना शुरू किया तो आज तक चल हीं रही है । रूकने का नाम नहीं ले रही । आज भी यह फिल्म कहीं लगती है तो इसके दीवानों की कमी नहीं होती ।

अकबर बने पृथ्वी राज कपूर के जूते हीं 4000 /- रूपये के थे , जिसे देख कर फिल्म के फोटोग्राफर आर डी माथुर ने कहा था-दर्शक उस दौर के जूते देखेंगे या उस दौर की जूतों की कीमत देखेंगे ? यह फिजूलखर्ची पर एक तरह का तंज था । के आसिफ ने कहा कि इन जूतों को जब पृथ्वीराज कपूर पहनेंगे तो स्वभाविक तौर पर उनके चेहरे पर अकबर जैसा हीं तेज आ जाएगा । वे अपने को अकबर मान स्वभाविक अभिनय करेंगे । के आसिफ हर दृश्य के लिए शत प्रतिशत स्वभाविकता चाहते थे । इसलिए उन्होंने " मोहें पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो रे " गीत के फिल्मांकन के लिए कृष्ण की विशुद्ध सोने की हीं मूर्ति मंगवायी । कपड़ों की सिलाई के लिए दिल्ली से दर्जी व सूरत से कशीदाकार विशेष तौर पर बुलाए गये थे । आभूषण हैदराबाद से और ताज कोल्हापुर से मंगवाए थे । राजस्थान के कारीगरों ने हथियार बनाए थे ।

इंदौर के शीश महल में मुगल - ए - आजम की शूटिंग होनी थी । किसी कारणवश शूटिंग करने की अनुमति नहीं मिली । निर्माता का कहना था कि कहीं और शूटिंग कर ली जाय , पर के आसिफ अड़ गये उसी तरह के सेट के लिए । उसी तरह का सेट तैयार हुआ । वेल्जियम से स्पेशल शीशे मंगवाए गये । सेट को तैयार होने में दो साल लग गये । कुल लागत आई एक करोड़ रूपए । कुल डेढ़ करोड़ की लागत वाली इस फिल्म के शीशे के सेट को छोड़कर लागत हुई केवल 50 लाख । इस सेट पर गाना फिल्माया गया था - जब प्यार किया तो डरना क्या । यह गीत हीं फिल्म की जान बनी , जिस पर मधुबाला ने बड़ी शिद्दत से नृत्य किया है । इस गीत पर पृथ्वी राज कपूर का आक्रोश देखते हीं बनता है ।

85% श्याम श्वेत व 15% रंगीन "मुगल - ए - आजम " को तीन फिल्म फेयर पुरूष्कार -सर्वश्रेष्ठ फिल्म , सर्वश्रेष्ठ छायांकन व सर्वश्रेष्ठ संवाद का मिल चुका है । यह उर्दू / हिंदी , तमिल व अंग्रेजी में एक साथ रिलीज हुई थी । अकबर के बेटे सलीम व एक कनीज अनार कली के प्यार की दास्तान पर बनी फिल्म है, जो इतनी प्रसिद्ध हो जाएगी किसी ने भी नहीं सोचा था । आज इस फिल्म को बने 50 साल से ऊपर हो चुके हैं ; लेकिन फिल्म की लोकप्रियता को देख ऐसा लगता है कि जैसे कल की बात हो ।

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