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कोई सुनता नहीं खुदा के सिवा

Bhola Tiwari May 31, 2019, 7:59 AM IST टॉप न्यूज़
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 एस डी ओझा

टाॅम आल्टर के दादा दादी अमेरिका से आए थे । टाॅम आल्टर के दादा ईशाई मिशनरी में काम करते थे । सर्व प्रथम वे 1916 में पानी के जहाज से चेन्नई पहुंचे । चेन्नई से वे ट्रेन से सफर कर लाहौर आए । यहां पहुंचकर टाॅम आल्टर के दादा किसी ईशाई स्कूल में धर्म गुरू बन गये थे । जब 1947 में देश का विभाजन हुआ तो टाॅम आल्टर के पिता भारत आ गये । टाॅम के दादा दादी पाकिस्तान में हीं रह गये थे । टाॅम आल्टर के पिता ने इलाहाबाद , फिर जबलपुर और सहारनपुर में रहने के बाद अंतत: मसूरी में अपना बसेरा बनाया । सहारनपुर में 22 जून 1950 को टाॅम आल्टर का जन्म हुआ था ।

मसूरी में रहते हुए टाॅम आल्टर ने कोर्स की किताबों के साथ हिंदी सीखी । इनके सहपाठी इन्हें "नीली आंखों वाला " कहकर चिढ़ाते थे । वे गाते थे - दे गयीं धोखा हमें नीली नीली आंखें । यह गीत राजकपूर के फिल्म आवारा (1951) का था , जिसका मुखड़ा था - एक बेवफा से प्यार किया । जब टाॅम आल्टर बड़े हुए तो स्थानीय लोगों ने उन्हें " नीली आंखों वाला साहब " कहना शुरू किया । 18 वर्ष की कम उम्र में टाँम आल्टर को येल से ग्रेजुएशन करने के वास्ते अमेरिका भेज दिया गया । वहां की पढ़ाई उन्हें रास नहीं आई । उन्हें वहां अपने भारतीय मित्रों की बेहद याद आ रही थी । टाॅम आल्टर अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़कर भारत आ गए ।

भारत पहुंचकर टाॅम आल्टर ने सबसे पहले अपनी ग्रेजुएशन पूरी की । उसके बाद वे सेंट थामस स्कूल जगाधरी , हरियाणा में शिक्षक नियुक्त हो गये । वे यहां बाईबिल पढ़ाते थे । जगाधारी में रहते हुए टाॅम को हिंदी फिल्मों का शौक हुआ । वह दौर राजेश खन्ना का था । टाॅम आल्टर को राजेश खन्ना का सिर हिलाने का अंदाज , उनकी डायलाग डिलीवरी व आंखों का इस्तेमाल करते हुए हंसना बेहद पसंद आया । उन्होंने राजेश खन्ना की आराधना " फिल्म एक हफ्ते की अंतराल में तीन बार देखी थी । हिंदी फिल्मों का यह शौक उन्हें पूना ले गया , जहां उन्होंने " फिल्म एण्ड टीवी इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया " से 1972-74 में अभिनय सीखा । टाॅम आल्टर के साथी थे - नसीरूद्दीन शाह , शबाना आजमी और बेंजामीन गिलानी ।

1977 में टाॅम आल्टर की शादी हुई । दो बच्चे हुए । बेटा जेमी और बेटी अफशान । टाॅम आल्टर ने अपने पुणे के साथियों नसीरूद्दीन , बेंजामीन और शबाना के साथ मिलकर एक थिएटर कम्पनी खोली । टाॅम ने एक लम्बा वक्त थिएटर को दिया । टाॅम आल्टर की थिएटर कम्पनी ने " गालिब इन दिल्ली " जैसे दर्जनों हिट नाटक सुधी दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किए । खाली वक्त में टाॅम आल्टर क्रिकेट समीक्षाएं दर्जनों अखबारों व पत्रिकाओं में लिखते रहे थे । जिस तरह से टाॅम राजेश खन्ना की वजह से हिंदी फिल्मों की ओर मुखातिब हुए थे , उसी प्रकार से टाॅम आल्टर सुनील गवास्कर का खेल देखकर क्रिकेट समीक्षक बने थे । सुनील गवास्कर ने हीं टाॅम आल्टर से सचिन तेंदुलकर का इंटरव्यू लेने के लिए कहा था । यह बात 1988 की है । सचिन तेंदुलकर का पहला इंटरव्यू टाॅम आल्टर ने हीं लिया । उन दिनों सचिन एक अंजाने से क्रिकेटर थे ।

टाॅम आल्टर ने हिंदी फिल्मों में भी काम किया है । उनकी पहली फिल्म रामानंद सागर की " चरस " (1976 ) थी । आम दर्शक टाॅम को एक ऐसा अभिनेता मानता है, जो फिल्मों में अंग्रेज किरदार निभाता है । कुछ हद तक यह बात सही है । फिल्म " शतरंज के खिलाड़ी " में सत्यजीत रे ने उन्हें अंग्रेज किरदार का रोल दिया था । फिल्म 'क्रांति' में टाॅम आल्टर ने लार्ड माऊंट बैटन का किरदार निभाया और खूब वाहवाही लूटी । लेकिन कुछ ऐसी फिल्में भी टाॅम ने की है , जिनमें उनका रोल अंग्रेज किरदार का नहीं है । उन्होंने एक असमिया फिल्म में भी काम किया है । बहुत सी धारावाहिकों में भी टाॅम आल्टर ने काम किया है , जिनमें से " जबान सम्भाल के " बेहद चर्चित रही थी । इन सब में सर्वोपरि प्राथमिकता टाॅम आल्टर ने हमेशा थिएटर को दिया ।

अब टाॅम आल्टर ने सब कुछ छोड़ रखा है । उन्हें स्कीन कैंसर हो गया है , जो कि अपने चतुर्थ चरण में है । इसके पहले यह रोग पकड़ में नहीं आ पाया था । डाक्टर इसे साधारण त्वचा रोग मानते रहे और तदनुसार हीं इलाज करते रहे । अब एक अंगूठा इस रोग के कारण उनके शरीर से अलग किया जा चुका है । रोग की गम्भीरता का अब जाके पता चला है । इस समय उनका इलाज मुम्बई के किसी कैंसर अस्पताल में चल रहा है । भगवान उन्हें अतिशीघ्र सेहतमंद करें । यही दुआ है ।

कोई चारा नहीं दुआ के सिवा ।

कोई सुनता नहीं खुदा के सिवा ।

( आल्टर अब इस दुनिया में नहीं हैं )

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